– निरंजन परिहार
Rajasthan: मरुप्रदेश की सियासत में सन्नाटा टूटने वाला है। सत्ता के गलियारों में फिर से चहल – पहल बढ़ने वाली है। सूनी कुर्सियों पर सियासी चेहरे बैठने वाले हैं। और बरसों से इंतजार कर रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं व नेताओं की धड़कनें तेज होने लगी हैं। राजस्थान (Rajasthan) में राजनीतिक नियुक्तियों का मौसम आने वाला है। सरकार तैयार है, संगठन सक्रिय है और कार्यकर्ता बेचैन। बीजेपी (BJP) अब अपने उपेक्षित और दरकिनार नेताओं को भी गले लगाने वाली है। भजनलाल शर्मा (Bhajanlal Sharma) के नेतृत्व वाली सरकार उनको फिर से ताकत देने की तैयारी में जुट चुकी है।
कार्यकर्ताओं की आग जिंदा रखने की जरूरत
मुख्यमंत्री भजनलाल के दिल्ली दौरे के बाद कभी भी राजनीतिक नियुक्तियों का बिगुल बज सकता है। बोर्ड, कॉर्पोरेशन, कमीशन और कमेटियां। करीब दो हजार पद। और उन पर बैठने के लिए लंबी कतार। राजस्थान बीजेपी में वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को लगने लगा था कि सत्ता तो आ गई, लेकिन सत्ता का स्वाद कुछ लोगों तक ही सीमित रह गया। जिन्होंने पसीना बहाया। जिन्होंने संघर्ष किया। जिन्होंने गांव – गांव कमल खिलाया। वे अब तक प्रतीक्षा में थे। अब बीजेपी को अहसास हो चुका है कि केवल सरकार चलाने से चुनाव नहीं जीते जाते। चुनाव जीतने के लिए कार्यकर्ताओं की आग जिंदा रखनी पड़ती है। नेताओं की महत्वाकांक्षा को सम्मान देना पड़ता है। और संगठन की ऊर्जा को लगातार सक्रिय रखना पड़ता है। यही वजह है कि अब बीजेपी अपने राजनीतिक सैनिकों को फिर से मैदान में उतारने जा रही है।

नाराजगी को अवसर में बदलने का वक्त
राजस्थान में बीजेपी सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके हैं। और 5 साल के लिए बनी सरकार के लिए भले ही अब ढाई साल का वक्त बचा है। लेकिन सत्ता का दूसरा हिस्सा हमेशा ज्यादा कठिन होता है। पहले ढाई साल सत्ता संभालने में निकल जाते हैं। अगले ढाई साल सत्ता बचाने में। सत्ता के लिए आखरी साल तो चुनावी साल होता है। इसलिए कायदे से तो केवल डेढ़ साल ही बचा है। ऐसे में, बीजेपी के रणनीतिकार यह अच्छी तरह समझ रहे हैं कि अगर उपेक्षित नेताओं को समय रहते साधा नहीं गया, तो आने वाले चुनाव में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इसलिए अब राजनीतिक नियुक्तियों के जरिए नाराजगी को अवसर में बदलने की तैयारी है। जिसका जैसा कद। उसको वैसा पद। किसी को बोर्ड में बिठाएंगे, तो किसी को कॉर्पोरेशन में कुर्सी। किसी को आयोग का कमान तो किसी को समिति में सदस्य। राजनीति में पद केवल कुर्सी नहीं होता। पद संदेश होता है, सम्मान होता है और भविष्य की संभावनाओं का संकेत भी। इसीलिए सत्ता के गलियारों में नामों की फुसफुसाहट तेज हो चुकी है।
कई दिग्गजों को भी नियुक्ति की प्रतीक्षा
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक परनामी की चर्चा है, तो डॉ सतीश पूनिया का नाम भी है। राजेंद्र राठौड़, प्रभुलाल सैनी, नरपत सिंह राजवी को लेकर को लेकर सबसे ज्यादा चर्चाएं हैं। राजपाल सिंह शेखावत और कनकमल कटारा जैसे नेताओं के नाम भी तैर रहे हैं। कई दिग्गजों को भी नियुक्ति की प्रतीक्षा है, तो कुछ सक्रियता के रथ पर सवार नेता भी हैं। चंद्रकांता मेघवाल, संतोष अहलावत, मोहनलाल गुप्ता, निर्मल कुमावत, नारायण पंचारिया, एडवोकेट वीरेंद्रसिंह चौहान, डॉ रामप्रताप, अजयपाल सिंह, मानवेंद्र सिंह जसोल, पुष्प जैन, देवजी पटेल, अशोक लाहोटी जैसे नेताओं के नाम भी शामिल हैं। अगले महीने राज्यसभा से रिटायर होने वाले सांसद राजेंद्र गहलोत जैसे बड़े जनाधार वाले नेता की भी चर्चा है। उनको घर बिठाने से पार्टी को कोई लाभ नहीं है। कई नेता व कार्यकर्ता ऐसे हैं, जो संगठन में वर्षों की तपस्या के बाद अब राजनीतिक प्रतिफल की प्रतीक्षा में हैं। कुछ वे भी हैं, जो उपेक्षित और दरकिनार महसूस कर रहे हैं। उनको भी अवसर की तलाश है। जिम्मेदारी मिली नहीं कि सक्रियता से लगेंगे। सूची लंबी है और उम्मीदें उससे भी लंबी।

अगले चुनाव का आधार बनाने की कोशिश
बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि वह केवल चुनावी पार्टी नहीं है। वह संगठन आधारित राजनीतिक संस्कृति है। जहां कार्यकर्ता को महत्व मिलता है। जहां विचारधारा को पद से ऊपर माना जाता है। संघ परिवार की भूमिका भी इसी वजह से महत्वपूर्ण मानी जाती है। कौन कार्यकर्ता जमीन पर कितना सक्रिय रहा। किसने संगठन के लिए कितना संघर्ष किया। कौन हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की विचारधारा के प्रति कितना समर्पित रहा। इन सबका हिसाब रखा जाता है। सीए, डॉक्टर, वकील, इंजीनियर, पत्रकार, लेखक, साहित्यकार, कवि और समाजसेवी भी हैं, जिनको समाहित किया जा सकता है। बीजेपी जानती है कि राजस्थान की राजनीति केवल सत्ता प्रबंधन से नहीं चलती। यहां जातीय समीकरण भी हैं। क्षेत्रीय संतुलन भी है। सामाजिक प्रतिनिधित्व भी है और स्थानीय असंतोष भी। इसलिए राजनीतिक नियुक्तियां केवल नियुक्तियां नहीं होंगी। वे 2028 की चुनावी रणनीति का आधार बनेंगी।
सत्ता का रथ पूरी रफ्तार से दौड़ाने की तैयारी
दिल्ली से लेकर जयपुर तक बैठकों का दौर तेज है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और संगठन महासचिव बीएसल संतोष के साथ होने वाली चर्चाओं पर सबकी नजर है। बीजेपी अब कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। क्योंकि राजस्थान की राजनीति हमेशा करवट बदलती रही है। यहां सत्ता स्थायी नहीं होती। यहां जनता हर चुनाव में नया संदेश देती है। इसीलिए बीजेपी अब संगठन की जड़ों में फिर से पानी डालने जा रही है। ताकि कार्यकर्ता फिर से जोश में आएं। नेता फिर से सक्रिय हों। और सत्ता का रथ फिर से पूरी रफ्तार से दौड़ सके। राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों की यह तैयारी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह आने वाले चुनाव का शंखनाद है। यह सत्ता बचाने की रणनीति है। और बीजेपी के उस बड़े सियासी अभियान की शुरुआत भी, जिसमें हर उपेक्षित चेहरे को फिर से महत्व देकर चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी चल रही है। मतलब, राजस्थान की सियासत में अब सन्नाटा टूटेगा और नई खुशियों का शोर तय है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )
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