Ajit Pawar: आसमान गति का प्रतीक माना जाता है। प्रगति की पतवार माना जाता है। उसी आसमान से हमारी सियासत के संवरते सपने टूटकर बार-बार ज़मीन पर गिरते रहे हैं। खासकर विमान हादसों में, जब किसी नेता के ना रहने की खबर मिलती है, तो वह केवल एक व्यक्ति की कमी की सूचना नहीं होती, वह लोकतंत्र की स्मृति के पन्नों में दर्ज एक और हादसे से खाली कुर्सी की दर्दनाक कहानी बन जाती है। अजीत पवार (Ajit Pawar) भी विमान हादसे में समा गए। लेकिन बारामती (Baramati) में हुए इस विमान हादसे (Plane Crash) में उन का जाना, महज दुर्घटना नहीं, आघात है, वज्रपात है। जो हमारी सियासत पर पहले भी कई बार होते रहे हैं, कईयों की सियासत को सदा के लिए निगल गया आसमान, लेकिन हम सुधरते ही नहीं हैं।
संजय गांधी, सिंधिया, विजय रुपानी और अब अजित पवार
हमारे हिंदुस्तान ने ऐसे कई सियासी चेहरे खोए हैं, जिनकी उड़ानें हादसों की उड़ान बनकर सदा के लिए अधूरी रह गई। संजय गांधी, को कभी भारत का भविष्य कहा जा रहा था। संजय खुद पायलट थे। दिल्ली में सफ़दरजंग हवाई अड्डे पर, 23 जून 1980 को, एक निजी विमान उड़ा रहे थे, मगर हादसे में इतिहास बन गए। नागरिक उड्डयन मंत्री रहे माधवराव सिंधिया, जिनकी राजनीति में शालीन किस्म की गरिमा थी, वे भी बादलों के बीच कहीं खो गए। सिधिया का विमान 30 सितंबर, 2001 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी ज़िले की भोगांव तहसील के पास गिर गया। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी सहित कुल 5 लोग 2 सितंबर, 2009 को सुबह 8.38 बजे बेल-430 हेलीकॉप्टर से उड़े, मगर नल्लामाला के जंगलों में हेलीकॉप्टर का मलबा 3 सितंबर को मिला। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री दोरजी खांडू 30 अप्रेल 2011 को पवन हंस के सिंगल इंजन हेलीकॉप्टर एएस-बी-350-बी3 से उड़े, मगर उड़ान भरने के 20 मिनट बाद ही हेलीकॉप्टर लापता हो गया। दोरजी सहित 5 लोगों के शव 5 दिन बाद मिले। लोकसभा अध्यक्ष सीएम बालयोगी 3 मार्च 2002 को आंध्र प्रदेश के भीमावरम से उड़े और हेलीकॉप्टर उतरते वक्त नारियल के पेड़ से टकराया, जिसमें कुल 3 लोग मारे गए। हरियाणा के उर्जा मंत्री ओपी जिंदल और कृषि मंत्री सुरेंद्र सिंह 31 मार्च 2005 को चंडीगढ़ से दिल्ली जाते समय, पायलट सहित विमान हादसे में मारे गए। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रुपानी 12 जून, 2025 को अहमदाबाद लंदन जा रहे थे, एयर इंडिया की नियमित उड़ान थी। विमान उड़ते ही गिर गया, जिसमें सवार 242 लोगों में से 241 की मौत हो गई। रुपानी सहित दोरजी, सिंधिया, बालयोगी, जिंदल, रेड़ी और संजय गांधी सभी ऐसे लोग थे, जिनके लिए सियासत सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए सेवा की ज़िम्मेदारी जैसी प्राथमिकता थी। मगर, सारे के सारे कोई पहाड़ों में, तो कोई ऊंचे आकाश में हादसों के शिकार हो गए।

सियासत में जिंदगी के सामने समय का बड़ा हो जाना
माना कि जिंदगी किसी भी हाल में सबसे ज्यादा कीमती होती है और मौत सबसे खतरनाक। मगर, सियासत में पदों के हिसाब से समय की कीमतें बहुत महंगी हुआ करती हैं। हर कोई हड़बड़ी में, हर कोई जल्दी में और हर कोई सबसे आगे निकलने की होड़ में। यह इसलिए, क्योंकि सियासत में जिंदगी का हर पल बहुत निर्णायक, बेहद आवश्यक और अत्यंत उपयोगी माना जाता है। हमारे राजनेता विमानों में अक्सर इसीलिए उड़ते हैं। मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों और देश के दिग्गज राजनेताओं के साथ अपन भी सैकडों बार विशेष विमानों में उड़े हैं। और देखा है कि हर किसी को, हर हाल में हर जगह जल्दी पहुंचना होता है। इसलिए जानते हैं कि सियासत में जिंदगी के मुकाबले वक्त सबसे बड़ा माना जाता है। सो, आम तौर पर सुरक्षा की कीमत अक्सर कम आंक दी जाती है। ‘ज़रूरी मीटिंग है’, तुरंत पहुंचना है’, ‘तत्काल लौटना है’, ‘मौसम तो ठीक हो जाएगा’, और पायलट से यह सवाल कि ‘कैप्टन देख लोगे ना…?’ ये वाक्य ही कई बार नेताओं के अंतिम वाक्य सिद्ध होते हैं। और तब सवाल रह जाता है कि क्या यह ये हादसा टल सकता था?
विमान विश्वसनीय था, फिर भी हादसा बना हकीकत
अजीत पवार… जो लगभग एक अनवरत बहती नदी थे, जो अपना रास्ता खुद बनाते थे, और भले ही पहाड़ काटकर नदी बने, लेकिन पहाड़ से निकली वह नदी अचानक अदृश्य आसमान में विलीन हो गई। कुल 6 बार उपमुख्यमंत्री और 11 बार बजट पेश करने वाले अजीत पवार 28 जनवरी 2026 की सुबह 8.10 बजे मुंबई से अपने गांव बारामती के लिए उड़े थे। वक्त 8.43 का था, जब बारामती हवाईपट्टी पर उतरने की क्लीयरेंस मिली गई, मगर उतरने से पहले ही 8:44 बजे एयर ट्रेफिक कंट्रोल ने रनवे इलेवन के थ्रेशहोल्ड के पास आग की लपटें देखीं, विमान आग का गोला बन गया था। यह हादसा कुल 5 लोगों, अजीत पवार, उनके सुरक्षा अधिकारी विदिप जाधव, दोनों पायलट सुमित कपूर और शांभवी पाठक सहित क्रू मेंबर पिंकी माली को लील गया। विमान वही था, जो सालों से अजीत पवार की सेवा में था। ये विमान कनाडा की कंपनी बॉम्बार्डियर ऐरोस्पेस का बनाया 8 सीटर लियरजेट-45 डबल इंजन विमान था, जो विश्वनीय था और सुरक्षित भी। इस विमान में हनीवेल टर्बोफैन के डबल इंजन होते है, और भारत में इसे हाई स्पीड चार्टर यात्राओं के लिए प्राथमिकता के रूप में जाना जाता है। ये विमान छोटे रनवे वाले एयरपोर्ट्स पर भी आसानी से उतर सकता है। लेकिन फिर भी विमान की सांसें थम गईं, तो अजीत पवार के साथ कुल 5 लोगों की जिंदगी भी उड़ते आकाश में ही आग के गोले में समा गई। विमान की मालिक कंपनी वीएसआर वेंचर्स एविएशन के पास 17 विमान हैं। सारे बेहद सुरक्षित और दुरुस्त।

कभी हादसे हकीकत, तो कभी अति आत्मविश्वास से चूक
हर बार हादसों पर सरकारों ने श्रद्धांजलियां दी, नेताओं ने शोक मनाया और समर्थक धार धार रोए। देश ने कुछ दिनों तक सवाल पूछे, और फिर देश भी चुप हो गया। विमान और हेलीकॉप्टर हादसे हमें यह असहज सच बताते हैं कि वीआईपी होना सुरक्षा की गारंटी नहीं है। कहना दुखद है, लेकिन सियासत की जल्दबाज़ी, मौसमों को चुनौती, तकनीकी भरोसे का अति-आत्मविश्वास आदि सब मिलकर एक ऐसी श्रृंखला बनाते हैं, जहां एक छोटी सी चूक सीधे कई जिंदगियों को निगल जाती है। लाखों समर्थकों को सूना कर देती है। जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्टें आती हैं, नियम सख़्त होते हैं, पर स्मृतियां छोटी पड़ जाती है। दरअसल, विमान सुरक्षा कोई तकनीकी शब्द नहीं, यह नैतिक ज़िम्मेदारी है। पायलट की चेतावनी सुनना, मौसम का सम्मान करना, एटीसी के निर्देशों का तत्काल पालन होना और नागरिक उड्डयन की परंपराओं का निर्वहन, जहाज की संरक्षा जांच और प्रोटोकॉल को सत्ताधारियों के ओहदे से ऊपर रखना, यही असली नेतृत्व की परीक्षा है। ऐसे हादसे हमें याद दिलाते है कि विमान के उड़ने के नियमों का उल्लंघन केवल आंकड़ों में नहीं, मनुष्य के जीवन के पन्नों पर दुख की स्याही से लिखे जाते हैं। आसमान से आग बनकर विमानों से गिरते राजनीति के ये लोग हमें हर बार चेतावनी देते हैं कि प्रगति की उड़ान तभी सुरक्षित है, जब समझदारी कॉकपिट में सीमित हो। वरना हर टेक-ऑफ के साथ देश एक और नाम खोने का जोखिम उठाता रहेगा…!
– निरंजन परिहार
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