Rajasthan: राजनीति बड़ी बेदर्द होती है। दुख के दरिया में से भी अपने हिस्से का सुख निकाल ही लेती है। वह दुखियों के दुख जगाती है। दुखियारों के दर्द में खड़ी होती है। दुख दूर करने का अहसास जगाती है। और दूख दूर होने की उम्मीद पाले दुखियारे, जैसे ही राजनीति के साथ चल पड़ते हैं, तो राजनीति दुखियारों को उनके दुख के साथ छोड़कर, अपनी अगली राह पकड़ लेती है। लेकिन जब दुखियारे उनके वादों की याद दिलाते हैं, तो राजनीति के मैदान में ‘मतलब निकल गया है, तो पहचानते नहीं…’ गीत बजने लगता है। कोरोना (Corona) के संकटकाल में पूरे राजस्थान (Rajasthan) में लोग, जब बेमौत मर रहे थे, तब अपनी जान हथेली पर रखकर दूसरों की जान बचाने वाले कोविड स्वास्थ्य सहायकों (CHA) का यही हाल है। कांग्रेस (Congress) की सत्ता जाते जाते बेरोजगार हो गए और बीजेपी (BJP) के राज में उसके नेताओं के वादे के मुताबिक रोजगार पाने को बेजार हैं। सीएचए को मुख्यमंत्री (Chief Minister) भजनलाल शर्मा (Bhajanlal Sharma) से बड़ी उम्मीद है, क्योंकि वे एक सामान्य परिवार से निकल कर प्रदेश की सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं और इस नाते ऐसा माना जाता है कि वे सामान्य जनता के दर्द को समझते हैं।

कोरोनाकाल के हीरो सड़क पर बेसहारा
कोविड हेल्थ सहायक (सीएचए) परेशान हैं। चार साल हो गए, अपने हक और भविष्य की सुरक्षा के लिए आंदोलन कर रहे हैं। लेकिन राजनीति के आंख – कान सब बंद हैं। हमारी जिंदगी के ज्ञात इतिहास के सबसे बड़े संकटकाल कोरोना महामारी के दिनों में अपनी जान जोखिम में डालकर लाखों लोगों की जिंदगी बचाने वाले 27 हजार कोविड हेल्थ सहायक खराब हालात में जी रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि राजस्थान में, इन नर्सिंग प्रशिक्षित युवक – युवतियों ने कोरोना महामारी के सबसे कठिन दौर में, गांव-गांव जाकर जनता की सेवा की, वे अब बेरोजगारी, आर्थिक तंगी और सरकारी उदासीनता के शिकार हैं। परिहार कहते हैं कि इन युवाओं ने उस समय स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ बनकर काम किया। लेकिन महामारी का संकट कम होते ही मार्च 2022 में इन सभी की सेवाएं सरकार ने समाप्त कर दी। एक झटके में 27 हजार युवाओं का रोजगार छिन गया। तभी से सारे सड़क पर हैं। जबकि राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में नर्सिंग ऑफिसर और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के 19000 से ज्यादा पद वर्तमान में खाली होने के आंकड़े है। इनके अलावा नई भर्ती 2023 के बाद कोई नहीं भर्ती भी हुई है। हजारों हेल्थ सेंटरों में नए पद भी सृजित नहीं किए गए हैं।
कोई बेमौत मर गया, तो कोई मजदूरी को मजबूर
राजस्थान में बीजेपी सरकार को बने ढाई साल हो चुके हैं, मगर इन 27 हजार युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार की तरफ से कोई ठोस पहल नजर नहीं आती। हालात यह हैं कि महामारी के नायक कहे जाने वाले ये युवा बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। कई लोग मजबूरी में मनरेगा में मजदूरी और खेतों में खड़ी फसल काटने को मजबूर हैं। कईयों के परिवार आर्थिक संकट में हैं। कुछ युवाओं की आत्महत्या जैसी दुखद घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन युवाओं का इस्तेमाल सिर्फ राजनीतिक मंचों पर नारे लगाने और सरकार को घेरने के लिए किया गया था? परिहार का सवाल है कि सत्ता में आने के बाद वे ही मंत्री और नेता अब सीएचए से मिलने तक से क्यों कतरा रहे हैं, जिन्होंने कभी इनके संघर्ष को अपना मुद्दा बनाया था। परिहार कहते हैं कि जिन्हें योद्धा कहा गया, वे बेरोजगारी के दबाव में हैं। कोई आत्महत्या कर गया तो कोई मजदूरी को मजबूर है।

सत्ता में आते ही एकदम बदल गए बीजेपी के नेता
विडंबना यह है कि दीया कुमारी उप मुख्यमंत्री बन गई और किरोडीलाल मीणा मंत्री। बीजेपी के वरिष्ठ नेता डॉ सतीश पूनिया हरियाणा के प्रबारी बन गए और राजेंद्र राठोड़ सत्ता के सिपहसालार। बेरोजगारों के नेता उपेन यादव चुनाव हारने के बावजूद ताकतवर बने और, संतोष बावरी, राजकुमार शर्मा, जब्बर सिंह सांखला, प्रह्लाद गुंजल जैसे मंत्री, विधायक और नेता अब सरकार के साथ हैं। ये सारे वे ही हैं, जो सीएचए से मिल–मिल कर सत्ता में आते ही सबको फिर से काम पर लेने के वादे कर थे। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद चोटिया कहते हैं कि उस समय ये सारे नेता सत्ता में आने के की ललक पाले घूम रहे थे। उन्होंने आंदोलन पर बैठे सीएचए के धरना स्थलों पर जाकर तत्कालीन कांग्रेस सरकार को कोसा, मंच से वादे किए, और कहा कि बीजेपी की सत्ता आते ही सीएचए को सरकारी नौकरी में समाहित किया जाएगा। लेकिन सत्ता की मंजिल फतह होते ही तस्वीर बदल गई है। चोटिया कहते हैं कि अब कोई नेता उन कोविड योद्धाओं से मिलता तक नहीं।
युवाओं की उम्मीद कि कोई तो काम दे सरकार
दरअसल, कोविड हेल्थ सहायकों की कहानी सिर्फ बेरोजगारी की कहानी नहीं है, बल्कि यह राजनीति के उस चेहरे को भी उजागर करती है जिसमें संकट के समय युवाओं की सेवाएं तो ली जाती हैं, लेकिन संकट खत्म होते ही उन्हें भुला दिया जाता है। चार साल से आंदोलन कर रहे इन युवाओं की उम्मीद अब भी सरकार से ही है। कोरोनाकाल में, जब डॉक्टरों और अस्पतालों पर भारी दबाव था, तब ये ही 27 हजार सीएचए अपनी जान हथेली पर रखकर गांवों और कस्बों में लोगों की जांच, देखभाल और जागरूकता का जिम्मा संभाल रहे थे। वे मांग कर रहे हैं कि महामारी में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें सरकारी सेवा में समाहित किया जाए या कोई भी स्थायी रोजगार दिया जाए। लेकिन अगर सरकार की चुप्पी इसी तरह जारी रही, तो यह सवाल लंबे समय तक गूंजता रहेगा कि कोरोना काल में जनता की जान बचाने वालों के साथ आखिर इतनी बड़ी बेइंसाफी क्यों की गई?
– राकेश दुबे (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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