Rishi Sunak: ब्रिटेन में प्रधानमंत्री पद से रुखसत होने का बाद ऋषि सुनक (Rishi Sunak) के लिए अब बहुत कुछ ख़त्म सा हो गया है और ब्रिटेन (Britain) कोई भारत जैसी भावुक लोकतांत्रिक धाराओं वाला देश नहीं है कि जनभावना की अवहेलना करनेवाले किसी नेता को प्रजा आसानी से फिर से समर्थन देकर ताकत बख्श दे। तथ्य यह है कि भारतवंशी होने के बावजूद ऋषि सुनक ने ब्रिटेन में बसे भारतीयों (Indian) के लिए ऐसा कुछ भी उल्लेखनीय नहीं किया कि वे उनसे जुड़े रह सकें और सत्य यह भी है कि जिन ब्रिटिश भारतीयों (British Indian) ने ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने पर ऋषि पर गर्व और गौरव का गुणगान किया, उन्हीं की भावनाओं की लाज वे नहीं रख पाए। इसलिए सवाल यह है कि प्रधानमंत्री पद पर रहने के बावजूद अपनों को ही अपना न समझने और अपनों के सपनों के लिए भी कुछ न करने वाले ऋषि सुनक को इतिहास क्यों माफ करेगा? ब्रिटेन में ऋषि सुनक की कंजर्वेटिव पार्टी (Conservative Party) करारी हार गई है और सुनक लगभग दो साल तक प्रधानमंत्री रहने के बाद अब भूतपूर्व हैं। नए प्रधानमंत्री कीर स्टारमर (Keir Starmer) ने 5 जुलाई 2024 को 10 डाउनिंग स्ट्रीट से अपना पहला भी संबोधन दिया है। राजनीति में हार जीत होती रहती है, लेकिन सुनक के नेतृत्व में पार्टी की ऐतिहासिक हार और उनके प्रधानमंत्रीकाल की शर्मनाक समाप्ति ने उनकी राजनीतिक स्थिति को सवालों के घेरे में ला दिया है।

भारतीय पीएम फिर भी भारतीयों को लाभ नहीं
ऋषि सुनक जब प्रधानमंत्री बने थे, तो पहले गैर-ईसाई, ब्रिटिश भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने इतिहास रच दिया था। पुराने ब्रिटिश भारतीयों, वहां के अनिवासी भारतीयों और भारत में रहने वाले कई लोगों के लिए यह गर्व की बात थी। मगर, अपनी वैभवी जीवनशैली के कारण सुनक कामकाजी लोगों की रोजमर्रा की वास्तविकताओं और आमजन के संघर्षों से दूर थे। ऋषि सुनक भारतीय दिग्गज आइटी कंपनी इन्फोसिस के संस्थापक नारायणमूर्ति और सुधा मूर्ति के दामाद हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि सुनक की हार के पीछे भारतीय मूल के लोगों का गुस्सा ही सबसे बड़ा कारण है। परिहार बताते हैं कि इसी वजह से इस चुनाव में ऋषि सुनक की पार्टी को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों का भी साथ नहीं मिला। सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही परिहार अक्सर लंदन में रहते हैं और वहां की राजनीतिक धाराओं पर नजर भी रखते हैं। वे कहते हैं कि जैसा कि किसी भी अपने व्यक्ति के किसी अधिकारिक पद पर पहुंचने पर हर किसी को उम्मीद होती है, तो सुनक के प्रधानमंत्री बनने के बाद ब्रिटेन के भारतीय मूल के लोगों को भी कुछ उम्मीदें थीं। लेकिन सुनक से ब्रिटिश भारतीयों को निराशा ही मिली। सुनक और अन्य भारतवंशी नेताओं की वजह से कंजर्वेटिव पार्टी ने ब्रिटेन में बसे भारतवंशी समुदाय के बड़े हिंदू हिस्से को अपना वोट बैंक बना लिया था, मगर सिख भारतवंशी लेबर पार्टी के साथ बने रहे। भारतीयों का कहना है कि सुनक ने भारतीयों के पक्ष में कोई भी बड़ा कदम नहीं उठाया गया। खास तौर से भारतीयों के वीजा के नियमों में पहले से भी ज्यादा कड़ाई कर दी गई है साथ ही रोजगार के मुद्दों पर भी सुनक ठोस कदम नहीं उठा पाए हैं। एक जानकारी के मुताबिक बीते 5 साल में 83 हजार 468 भारतीयों ने ब्रिटेन की नागरिकता ली, जो कि यूरोप के किसी भी देश में ये सबसे ज्यादा है। इससे पहले 2022 तक गोल्डन वीजा स्कीम के तहत 254 भारतीय अमीरों ने ब्रिटेन की नागरिकता ली थी।
अपनों से दूरी बनाना भारी पड़ा सुनक को
ब्रिटेन में भारतीय मतदाता लगभग 1 फीसदी हैं। अंक गणित के हिसाब से यह 1 फीसदी भले ही सबसे छोटा आंकड़ा हो, लेकिन किसी भी चुनाव में हार जीत के लिए 1 फीसदी वोट बहुत ज्यादा होते हैं। इस चुनाव ने साबित किया है कि भले ही सुनक पहले अश्वेत नेता और प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने वाले पहले हिंदू और पहले भारतीय थे और लोग उन पर बहुत गर्व भी करते रहे। लेकिन ब्रिटिश भारतीयों से वे कोई खास नाता नहीं बन सके। ब्रिटिश अर्थशास्त्री भारतवंशी लॉर्ड मेघनाद देसाई ने बीबीसी की पत्रकार सारिका सिंह से कहा कि ऋषि सुनक नेता नहीं, बल्कि एक बैंकर हैं और जनता के साथ उनका कनेक्ट आसानी से नहीं होता था। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार बताते हैं कि यही कारण रहा कि सुनक के प्रधानमंत्री होने के बावजूद लंदन सहित पूरे ब्रिटेन के भारतीयों में यह आम धारणा रही कि वे अपने ही लोगों के लिए कोई बहुत अच्छे तो छोड़िये, सामान्य प्रधानमंत्री भी नहीं बन सके। परिहार बताते हैं कि ब्रिटेन में 80 सीटों पर भारतीय मतदाता निर्णायक हैं और सिखों की तादाद तो इतनी ज्यादा है कि अकेले वे ही कई सीटों पर हार जीत तय करते हैं। फिर भी पता नहीं क्यों सुनक का व्यक्तिगत व्यवहार और राजनीतिक आचरण ऐसा रहा कि भारतवंशी लोगों को स्पष्ट लगता रहा कि सुनक उन्हें कम पसंद करते हैं। यही वजह रही कि चुनाव पूर्व सर्वे में लगभग 70 फीसदी भारतवंशी मतदाताओं ने सुनक के प्रति नाराजगी जाहिर की थी। लंदन स्थित बीबीसी संवाददाता राघवेंद्र राव कहते हैं कि इतिहास में सुनक को कंजर्वेटिव पार्टी के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले नेता और अपने ही लोगों के बीच शुरू से ही अलोकप्रिय होनेवाले व्यक्ति के रूप में जाना जाएगा। राघवेंद्र बताते हैं कि सुनक पहले भारतीय मूल के व्यक्ति थे जो ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और इसे लेकर गर्व भी जताया गया। लेकिन अब इसे एक कलंक की तरह देखा जा रहा है जिसे मिटा पाना उनके लिए बेहद मुश्किल होगा।

सबसे बुरी हार का कलंक सुनक के माथे पर
कीर स्टारमर की लेबर पार्टी ने 5 जुलाई को ऋषि सुनक के नेतृत्व वाली कंजर्वेटिव पार्टी के 14 साल के विजय रथ को तोड़कर इतिहास में अपना नाम दर्ज करा लिया। कीर स्टारमर पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर के बाद 400 से अधिक सीटें जीतने वाले दूसरे प्रधानमंत्री बन गए हैं। और इसके विपरीत, ब्रिटेन के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ी चुनावी हार झेलने वाले प्रधानमंत्री के रूप में ऋषि सुनक का नाम दर्ज हो गया है। 650 सीटों वाले सदन में कंजर्वेटिव पार्टी ने सिर्फ़ 120 सीटें जीती हैं, जो पिछले चुनाव से लगभग 250 सीटें कम है।सुनक को सबसे युवा ब्रिटिश प्रधानमंत्री के रूप में भी जाना जाता है। वे केवल 44 साल की उम्र में भूतपूर्व प्रधानमंत्री के रूप में पद छोड़ रहे हैं। बहुत कम उम्र में ही बहुत ज्यादा मिल गया। बीते 100 साल से भी ज़्यादा समय में वे सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने। फिर सांसद बनने के सिर्फ़ सात साल बाद ही, सुनक प्रधानमंत्री भी बन गए थे। डाउनिंग स्ट्रीट के किसी भी हाल के प्रधानमंत्री की तुलना में यह सबसे कम संसदीय समय रहा – केवल सात साल। सुनक ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर अपने अंतिम भाषण में कहा – मेरे लिए यह एक बेहद मुश्किल दिन है, लेकिन मैं दुनिया के सर्वश्रेष्ठ देश का प्रधानमंत्री होने का सम्मान पाकर यह पद छोड़ रहा हूं।
अपनी अमीरी में ही मस्त मगन रहे सुनक
फिर, उनकी अथाह संपत्ति ने उनके बारे में नकारात्मक धारणाओं का वातावरण बनाया। वे किंग चार्ल्स – 3 से भी ज्यादा अमीर हैं। अपनी सिलिकॉन वैली पृष्ठभूमि और अरबपति ससुराल वालों के जंवाई की छवि के कारण सुनक को अक्सर आम मतदाताओं से बुरी तरह से कटे होने के आरोपों का सामना करना पड़ा। सुनक और उनकी पत्नी अक्षता नारायण मूर्ति को अक्सर महंगे कपड़ों और अन्य भव्य परिधानों में देखा जाता रहा, जिसने देश के कामकाजी वर्ग के लोगों से उनकी कनेक्टीविटि ही नहीं बन सकी। वे आम लोगों से अलग-थलग पड़ गए। कुल 651 मिलियन पाउंड की अनुमानित संपत्ति के साथ, ऋषि सुनक और उनकी पत्नी अक्षता नारायण मूर्ति 10 डाउनिंग स्ट्रीट के अब तक के सबसे धनी निवासी रहे हैं। मगर, खास बात यही रही कि वे ब्रिटेन में अपने ही भारतीय समाज के लोगों के भी काम नहीं आए। भारतीय मूल के हिंदू होने के बावजूद ऋषि सुनक द्वारा भारतीयों से और हिंदूओं से दूरी बनाए रखने के कारण भारतीय तो उनको माफ कभी नहीं करेंगे, लेकिन इतिहास भी माफ नहीं करेगा, क्योंकि सुनक ने अपनी पार्टी के 346 साल के इतिहास में सबसे बुरी चुनावी हार में धकेला है।
-आकांक्षा कुमारी