Shivsena: सियासत में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो पहली नजर में बेहद मार्मिक लगते हैं, लेकिन राजनीति (Politics) की गहराई में उतरते ही उनके अर्थ बदल जाते हैं। महाराष्ट्र (Maharashtra) की राजनीति में इन दिनों ऐसा ही एक दृश्य उपस्थित है, जिसके केंद्र में उद्धव ठाकरे (Udhav Thackarey) हैं। शिवसेना (Shivsena) के स्थापना दिवस पर, उद्धव ठाकरे ने उनकी पार्टी छोड़कर जा रहे सांसदों के आरोपों के संदर्भ में भावुक होकर यह कहा है कि यदि उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप सही हैं, तो वे शिवसेना प्रमुख का पद छोड़ने को तैयार हैं। पहली नजर में यह बयान भावनाओं से भरा हुआ लगता है। लेकिन राजनीति आत्म-स्वीकृति से नहीं, शक्ति प्रदर्शन से चलती है; और राजनीति में भावनाओं का उपयोग होता है, उनका शासन नहीं।
मुंबई आर्थिक राजधानी, मगर मराठी माणूस संपन्न क्यों नहीं
दरअसल, भारतीय राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है, जिसमें भावनाओं ने चुनाव जिताए हैं, सरकारें बनवाई हैं और बड़े-बड़े नेताओं को नायक और जननायक बनाया है। महाराष्ट्र में तो यह परंपरा और भी पुरानी है। बाल ठाकरे ने मराठी अस्मिता, मराठी स्वाभिमान और “मराठी माणूस” के सम्मान को राजनीतिक आंदोलन का रूप देकर शिवसेना को खड़ा किया था और बाल ठाकरे से बालासाहेब ठाकरे बन गए। ये वो दौर था, जब मुंबई तेजी से बदल रही थी और मराठी समाज को लग रहा था कि उसकी पहचान और अवसर दोनों सीमित होते जा रहे हैं। ऐसे समय में बाल ठाकरे की आवाज मराठी समाज की सामूहिक बेचैनी की आवाज बन गई। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सच यह है कि हर आंदोलन की एक उम्र होती है। हर नारा एक समय के बाद अपनी परीक्षा देता है। और हर भावनात्मक मुद्दे को अंततः जनता की रोजमर्रा की जिंदगी के सवालों के सामने खड़ा होना पड़ता है। यहीं आकर उद्धव ठाकरे की राजनीति सबसे बड़ी चुनौती से टकराती दिखाई देती है। सवाल यह नहीं है कि मराठी माणूस आज भी बाल ठाकरे का सम्मान करता है या नहीं। सम्मान आज भी है। सवाल यह है कि क्या केवल सम्मान के आधार पर राजनीति की नई पीढ़ी खड़ी की जा सकती है? क्या केवल भावनात्मक अपीलों के सहारे नई राजनीतिक जमीन तैयार की जा सकती है? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या मराठी अस्मिता की राजनीति ने उस मराठी समाज को आर्थिक रूप से उतना मजबूत बनाया, जितना मजबूत बनाने का वादा किया गया था? मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। यह वह शहर है जहां देश के कोने-कोने से लोग आते हैं, संघर्ष करते हैं, कारोबार खड़ा करते हैं और कुछ वर्षों में ही करोड़पति और अरबपति तक बन जाते हैं। इस शहर ने हजारों उद्योगपति, उद्यमी, व्यापारी, और कॉरपोरेट नेतृत्व पैदा किए। लेकिन यदि शिवसेना की दशकों की राजनीति को मराठी समाज के आर्थिक सशक्तिकरण की कसौटी पर रखा जाए, तो उसके नेतृत्व को असहज करने वाले कई सवाल सामने खड़े हो जाते हैं।

शिवसेना की भावनात्मक राजनीति की कलई खुलने का दौर
शिवसेना ने मराठी युवाओं के लिए नौकरियों की मांग की। स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दिलाने के आंदोलन किए। आवास, झोपड़पट्टी पुनर्वास, चाल और खोली संस्कृति के मुद्दे उठाए। लेकिन क्या उसने मराठी समाज के भीतर बड़े पैमाने पर उद्यमिता की संस्कृति विकसित करने की कोई व्यापक राजनीतिक परियोजना खड़ी की? क्या उसने मराठी युवाओं को नौकरी मांगने वाले से नौकरी देने वाला बनाने का कोई आंदोलन चलाया? क्या वड़ा – पाव बेचने से ऊपर उठने की सोच का दम दिखाया? राजनीति में यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण होता है। कोई भी नेता अपने समर्थकों को रोजगार दिलाने की बात कर सकता है, लेकिन दूरदर्शी नेतृत्व वह होता है जो अपने समाज को आर्थिक रूप से इतना सक्षम बना दे कि वह रोजगार का सृजनकर्ता बन जाए। आज दक्षिण मुंबई की जिन गलियों और बस्तियों में कभी मराठी परिवारों का वर्चस्व था, वहां गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो चुकी हैं।रियल एस्टेट के विस्फोट ने शहर का भूगोल बदल दिया है। लेकिन इस बदलाव में मराठी समाज का कितना हिस्सा मालिक बन पाया और कितना हिस्सा केवल दर्शक बनकर रह गया, यह बहस का विषय है। हजारों परिवारों को मुंबई के केंद्र से दूर विरार, पालघर, अंबरनाथ, बदलापुर और टिटवाला जैसे इलाकों की ओर जाना पड़ा। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति में वैसी छलांग नहीं दिखी, जैसी मुंबई की जमीनों के मूल्यों में दिखाई दी और उनकी कमाई ने भी वैसा कमाल नहीं दिखाया, जैसा उनके घरों की जमीनों पर खड़ी इमारतों के अक्स में दिखता है। अब उद्धव ठाकरे और उनसे पहले बाल ठाकरे के भावुक नारों की बिसात पर जिन भावनाओं से भर कर साधारण मराठी माणूस पीढ़ी दर पीढ़ी उनके लिए लगातार जूझता रहा, वह जब अपने आसपास नजर दौड़ाता है, तो उसकी पहचान केवल मिल मजदूर का बेटा होने, चाल में रहने वाले, झोपड़पट्टी से निकलकर एसआरए की खोली में बसने वाले और वड़ा पाव बेचने वाले से ज्यादा की नहीं बन पाई है। जबकि उसके आसपास में बाहर से आए लाखों लोगों को विराट पैमाने पर विकसित होता देख रहा है, पर खुद वहीं खड़ा है। यही वह मोड़ है, जहां भावनात्मक राजनीति की सीमाएं उजागर होने लगती हैं या यूं कहें कि भावनाओं की राजनीति करने वालों के चेहरे से नकाब उतरने शुरू होते हैं।

उद्धव की भावुक अपील का प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा
हिंदुत्व की विचारधारा छोड़ कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने के बावजूद उद्धव ठाकरे को यह लग सकता है कि बाल ठाकरे की विरासत, मराठी अस्मिता और पारिवारिक नेतृत्व का भावनात्मक आकर्षण अब भी जनता को बांधे रखेगा। लेकिन आज का मतदाता पहले यह पूछता है कि उस नेता के कारण उसके जीवन में बदलाव क्या आया? उस नेता राजनीति के कारण उसके परिवार के विकास के अवसर कितने बढ़े? और उसकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति कितनी मजबूत हुई? यही कारण है कि उद्धव ठाकरे की भावुक अपील का वह प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा, जिसकी उद्धव ठाकरे ने अपेक्षा की थी। उनके समर्थक भी जानते हैं कि यदि शिवसेना प्रमुख का पद खाली होता है, तो वह किसी सामान्य कार्यकर्ता या किसी नए मराठी चेहरे तक तो वह पद पहुंचने वाला नहीं है। राजनीति की परंपरा और परिवारवाद की संरचना वही की वही रहने वाली है। उदद्व की जगह उनके बेटे आदित्य का उदय हो जाएगा। सियासत का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब जनता पर्दे के पीछे का खेल समझने लगती है। जब राजनीतिक प्रतीक वास्तविकता से टकराने लगते हैं। जब नारों की चमक और नेता का आकर्षण दोनों ही, समर्थकों के जीवन के रोजमर्रा के संघर्षों के सामने फीके पड़ने लगते हैं। उस वक्त किसी नेता के भावुक होने और आंखों से निकलने वाले आंसुओं की कीमत कम हो जाती है और उल्टे तर्क का महत्व बढ़ जाता है। उद्धव ठाकरे राजनीति के इस बदलते मानस को समझते हैं। लेकिन आज की उनकी स्थिति को भावनाओं की राजनीति करने वाले चेहरे से नकाब उतरने का वक्त कहा जा सकता है। इतिहास गवाह है कि भावनाएं आंदोलन खड़े कर सकती हैं, लेकिन आने वाला इतिहास उद्धव ठाकरे को पिता की विरासत से पथभ्रष्ट पुत्र के अलावा किसी और स्वरूप में याद करेगा, या फिर याद भी करेगा या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता।
-निरंजन परिहार
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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