Prashant Kishor: बिहार के बांकीपुर (Bankipur) में प्रशांत किशोर की जीत सिर्फ एक उपचुनाव का परिणाम नहीं है। यह बिहार (Bihar) की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत भी हो सकती है। देश के राजनीतिक फलक पर पीके के नाम से मशहूर प्रशांत किशोर (Prashant Kishor) ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी (BJP) के लगभग तीन दशक पुराने अभेद्य गढ़ को ध्वस्त कर अपनी पार्टी जनसुराज (Jansuraj Party) को पहली चुनावी जीत दिलाई है। बीजेपी 1995 से, लगातार 30 साल से इस सीट पर जीत दर्ज करती रही थी, लेकिन इस बार जनसुराज पार्टी के संस्थापक और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार को लगभग 19 हजार से अधिक मतों के अंतर से हरा दिया। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन (Nitin Nabin) का गढ़ कही जाने वाली बांकीपुर सीट की हार में बीजेपी के लिए भी बड़ा संदेश छिपा है, जिसे समय रहते समझ लेना चाहिए, वरना उसे आगे नुकसान ज्यादा भी हो सकता है।
बीजेपी का 30 साल का गढ़ 20 दिन में ढह गया
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट बांकीपुर की ये हार बीजेपी के लिए इसलिए अधिक गंभीर है, क्योंकि यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि बीजेपी के संगठन, उसकी रणनीति और राजनीतिक आत्मविश्वास पर लगा बड़ा प्रश्नचिह्न है। जिस सीट को बीजेपी अपने सबसे सुरक्षित शहरी गढ़ों में गिनती थी, उसे प्रशांत किशोर ने महज बीस दिनों के चुनाव अभियान में उसके हाथ से छीन लिया। इसका सीधा अर्थ है कि कहीं न कहीं पार्टी ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को हल्के में लिया। चुनाव के बीच उम्मीदवार बदलना, स्थानीय असंतोष को समय रहते न पहचान पाना और यह मान लेना कि परंपरागत वोट बैंक हर परिस्थिति में साथ रहेगा, बीजेपी की रणनीतिक भूलों में शामिल रहे। स्वयं बीजेपी ने भी परिणाम के बाद सार्वजनिक रूप से समीक्षा करने की बात स्वीकार की है।

सोच समझकर बीजेपी के मजबूत गढ़ में उतरे पीके
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने वर्षों तक दूसरों के लिए चुनावी रणनीति बनाने के बाद पहली बार स्वयं मैदान में उतरकर यह साबित करने की कोशिश की कि चुनाव केवल जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, संगठन और लगातार जनसंपर्क से भी जीते जा सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि प्रशांत किशोर ने जानबूझकर किसी आसान सीट के बजाय बीजेपी के सबसे मजबूत किले को चुनौती दी थी, ताकि खुद की और बीजेपी की ताकत का सीधा आंकलन गकिया जा सके। परिहार कहते हैं कि चुनाव से पहले प्रशांत किशोर जो कह रहे थे कि यदि बिहार को बदलना है तो राजनीति को सुरक्षित सीटों और पारंपरिक जातीय गणित से बाहर निकालना होगा, बीजेपी इस तथ्य को समझ ही नहीं सकी, और हार गई। राजनीतिक विश्लेषक परिहार के मुताबिक इस जीत के बाद अब पीके के सामने केवल राजनीतिक टिप्पणी करने की नहीं, बल्कि विधायक के रूप में अपने क्षेत्र में काम करके अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने की जिम्मेदारी भी होगी।
जनसुराज के विस्तार के लिए ये निर्णायक जीत
प्रशांत किशोर की इस जीत का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि जनसुराज अब केवल एक वैचारिक अभियान नहीं रहा, बल्कि चुनाव जीतने वाली पार्टी के रूप में भी अपनी पहचान बनाने लगी है। किसी भी नई पार्टी के लिए पहली जीत सबसे कठिन होती है। पहली जीत कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देती है, दानदाताओं का भरोसा बढ़ाती है, नए नेताओं को जोड़ती है और मतदाताओं को यह विश्वास दिलाती है कि उनका वोट व्यर्थ नहीं जाएगा। नवभारत टाइम्स के राजनीतिक संपादक राजकुमार सिंह कहते हैं कि प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज की इस पहली जीत ने उनके कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया है, तो बीजेपी के कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ा है। राजकुमार सिंह के मुताबिक बांकीपुर की यह सफलता पीके की पार्टी जनसुराज के संगठनात्मक विस्तार के लिए निर्णायक साबित हो सकती है। प्रशांत किशोर के राजनीतिक भविष्य की दृष्टि से यह जीत अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब तक उन्हें चुनावी रणनीतिकार के रूप में जाना जाता था। आलोचक अक्सर कहते थे कि दूसरों को जिताने वाला स्वयं चुनाव नहीं जीत सकता। बांकीपुर ने इस धारणा को चुनौती दी है।

पीके की इस जीत से क्या बदलेगा बिहार में
पीके लंबे समय तक प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चुनावी रणनीति पर काम करते रहे हैं। उसके बाद उन्होंने बिहार में नीतिश कुमार, पंजाब में अमरिंदर सिंह, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाड़ु में स्टालिन सहित कई बड़े दलों और नेताओं के साथ चुनावी रणनीति पर काम किया है। हालांकि, इस परिणाम का यह अर्थ निकालना भी जल्दबाजी होगी कि बिहार की पूरी राजनीति तत्काल बदल जाएगी। उपचुनाव और आम विधानसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग होती हैं। उपचुनाव अक्सर स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की छवि और सत्ता के प्रति असंतोष से प्रभावित होते हैं। इसलिए इस जीत को पूरे बिहार का अंतिम जनादेश मानना उचित नहीं होगा। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इस परिणाम ने बिहार की राजनीति को त्रिकोणीय बनाने की संभावना को मजबूत किया है। देश के जाने माने राजनीतिक संपादक प्रदीप सिंह कहते हैं कि बीजेपी के लिए बांकीपुर का यह चुनाव परिणाम एक बड़ी चेतावनी है। प्रदीप सिंह कहते हैं कि यदि स्थानीय नेतृत्व जनता से दूरी बना ले, उम्मीदवार चयन विवादों में घिर जाए या मतदाताओं को यह महसूस होने लगे कि उनकी शिकायतें नहीं सुनी जा रहीं, तो सबसे मजबूत राजनीतिक किले भी कमजोर पड़ सकते हैं। लंबे समय तक किसी सीट पर लगातार जीत मिलने से संगठन में आत्मसंतोष आ जाना स्वाभाविक जोखिम होता है।
बिहार की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही
राजनीति पर इसका व्यापक प्रभाव यह हो सकता है कि आने वाले बिहार के विधानसभा चुनाव में बीजेपी, राजद, जद(यू) और कांग्रेस जैसी स्थापित पार्टियों को जनसुराज को भी गंभीर प्रतिद्वंद्वी मानकर रणनीति बनानी पड़े। यदि प्रशांत किशोर इस जीत को संगठन विस्तार, स्थानीय नेतृत्व निर्माण और जनविश्वास में बदलने में सफल रहते हैं, तो वे बिहार की राजनीति में एक स्थायी शक्ति बन सकते हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह जीत केवल एक प्रतीकात्मक उपलब्धि बनकर रह जाएगी। इसलिए बांकीपुर का फैसला केवल बीजेपी की हार या प्रशांत किशोर की जीत नहीं है। यह बिहार के मतदाता का एक राजनीतिक संदेश भी है कि कोई भी गढ़ स्थायी नहीं होता और कोई भी नई ताकत असंभव नहीं होती। लोकतंत्र में अंततः जनता ही तय करती है कि किसे अवसर देना है, और बांकीपुर ने कम से कम इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि बिहार की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रहने वाली। इसलिए बीजेपी को भी अपने राजनीतिक रवैये में बदलाव करना होगा, कार्.यकर्ता का सम्मान करना होगा और संगठन व सत्ता को कठपुतलियों के हाथों से वापस लेकर चुनाव जिताने वाले सुरक्षित हाथों में सोंपना होगा।
– राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार)
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