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Home»Blog»Rajasthan Congress: बहुत कुछ ठीक करना होगा कांग्रेस को अपने घर में
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Rajasthan Congress: बहुत कुछ ठीक करना होगा कांग्रेस को अपने घर में

Prime Time BharatBy Prime Time BharatNovember 27, 2025No Comments
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Congress Rajasthan Team
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Rajasthan Congress: एक जमाने में राजस्थान में कांग्रेस इसलिए मज़बूत थी; क्योंकि उसके पास नए-पुराने और अपने आप मज़बूत हुए चेहरे थे। वे लोग जो जनता के बीच से उठकर आए थे, जिन्होंने जनसंघर्षों की आंच में अपने नेतृत्व को तपाया था और जो अपने समय और सामाजिक-आर्थिक हालात की दहलीज़ लांघकर आए थे। राजनीति में यह बात भले कुछ राजनीतिक साथियों को असहज करे, लेकिन आम नागरिक हमेशा उन नेताओं को तरजीह देता है, जिनका सार्वजनिक जीवन संघर्ष और मेहनत से बना हो, न कि विरासत से मिला हो।

Table of Contents

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  • गहलोत, धारीवाल, जोशी निकले ज़मीनी संघर्ष से
  • हार नहीं मानी, तो निकल गए कईयों से आगे
  • संघर्ष से अपनी ज़मीन तैयार की कई नेताओं ने
  • क्या करे, जो हार का दोष ईवीएम पर मढ़ते हैं
          • त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार व समीक्षक)

गहलोत, धारीवाल, जोशी निकले ज़मीनी संघर्ष से

कांग्रेस में पिछले वर्षों में एक दृष्टि-दोष गहराता गया है। अपने ही या बड़े मां – बाप के बेटे-बेटियों से आगे रखने और देख पाने का दोष। यही कारण है कि पार्टी अपने उस स्वर्ण काल की विरासत को भूलती चली गई, जिसे गांधी, नेहरू, तिलक, दादाभाई नौरोजी, व्योमेश चंद्र बनर्जी, बदरुद्दीन तैयबजी, पी. आनंदचारलु, रहमतुल्ला सयानी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपालकृष्ण गोखले, रासबिहारी घोष, बिशन नारायण डार, एनी बेसेन्ट, मदन मोहन मालवीय, हकीम अजमल ख़ां, अबुल कलाम आज़ाद, सरोजिनी नायडू, पटेल, सुभाष बोस, जेबी कृपलानी, ढेबर, कामराज, जगजीवन राम और असंख्य जमीनी-बौद्धिक नेताओं ने आकार दिया था। वे नेता जनता के बीच रहते थे और जनता ही उनकी असली शक्ति थी। हमारे समय के बड़े कांग्रेस नेताओं में अशोक गहलोत, शांति धारीवाल, सीपी जोशी सहित कितने ही नेता हैं, जिन्होंने न केवल ज़मीनी संघर्ष किया, पार्टी के भीतर भी कम पापड़ नहीं बेले। लेकिन आज स्थिति उलटती दिख रही है। जिन तरह नेताओं के बेटे-बेटियों को पद और ज़िम्मेदारियां बांटी गई हैं, वे आने वाले समय में कांग्रेस के लिए भारी बोझ साबित हो सकते हैं।

Rajasthan Congress Leaders Prime Time Bharat 1
Rajasthan-Congress-Leaders-Prime-Time-Bharat

हार नहीं मानी, तो निकल गए कईयों से आगे

इस बात की गंभीर पड़ताल भी शामिल होनी चाहिए कि ऐसे चयन के दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव क्या-क्या हो सकते हैं और यह संगठनात्मक संरचना को कहां-कहां कमजोर करता है। ऐसा नहीं कि अपवाद नहीं होते। लेकिन अपवाद को रवायत बना देना ग़लत है। अपवाद हमेशा मौजूद होते हैं। सचिन पायलट और दिव्या मदेरणा जैसे नेतृत्व उभरकर दिखाते हैं कि संघर्ष और क्षमता अब भी रास्ता बना सकती है। हनुमान बेनीवाल इसका बड़ा उदाहरण हैं। आज का युवा दिलीपकुमार के संघर्ष को तो नहीं जानता, लेकिन उसे नवाजुद्दीन सिद्दीकी का संघर्ष खूब याद है। इस मामले में सबसे बेहतर नाम को देखें तो अशोक चांदना को देखें, जिन्होंने यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव लड़ा और वे पवन गोदार से हार गए। लेकिन हार नहीं मानी और एमएलए भी बने और मंत्री भी। पवन गोदारा जैसे नौजवान नेता टैलेंट हंट में आगे आए; लेकिन बड़े नेताओं ने उन्हें मौक़ा नहीं दिया।

संघर्ष से अपनी ज़मीन तैयार की कई नेताओं ने

अभी अंता उपचुनाव के दो ही हासिल हैं। एक अशोक चांदना और दूसरे रमेश मीणा। चांदना न केवल विधायक बने, मंत्री भी रहे और अंता में उल्लेखनीय काम किया। गणेश घोघरा तो सरपंच थे और यूथ कांग्रेस के विधानसभा अध्यक्ष, जहां से वे विधायक बने। धीरज गुर्जर महासचिव थे यूथ कांग्रेस के। ऐसे नामों में रतन देवासी, इंदराज गुर्जर, मनीष यादव, अभिमन्यु पूनिया, मुकेश भाकर, राकेश पारीक, रामनिवास गावड़िया आदि भी हैं। संयम लोढ़ा ने नवभारत टाइम्स की पत्रकारिता छोड़कर राजनीति शुरू की और परिपक्व वैचारिक अंदाज में यहां तक पहुंचे। गोविंदसिंह डोटासरा तो प्रदेश अध्यक्ष बनने के समय शायद सीकर के जिला अध्यक्ष ही थे और राज्यमंत्री तो थे ही। हरीश चौधरी छात्र राजनीति से आए। महेश जोशी, प्रतापसिंह खाचरियावास, महेंद्र चौधरी कितने ही ऐसे नाम हैं, जिन्होंने संघर्ष से अपनी ज़मीन तैयार की। ये लोग जमीन पर हर समय दिखते हैं और काम करते हैं। लेकिन अधिकतर लोगों के साथ यह समस्या है कि वे पिता या माता के कारण आए और अब पार्टी की राहें रोक रहे हैं।

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क्या करे, जो हार का दोष ईवीएम पर मढ़ते हैं

एक नेता पांच बार बुरी तरह हार चुका। वह उस गन्ने की तरह है, जिसे गन्ने का रस निकालने वाला मानो चौथी बार नींबू डालकर भी निचोड़ चुका, लेकिन कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व और हाईकमान को लगता है कि अभी उसमें बहुत रस बाकी है। अब ऐसी पार्टी का आप क्या कर लो! हारेंगे तो कहेंगे, वोट चोरी हो रही है या ईवीएम गड़बड़ है! और कांग्रेस का हाल देखिए कि अध्यक्षों के नाम पहले से ऐसे वायरल हो रहे हैं, जैसे ये लिस्टें किसी चौपाटी पर तैयार हो रही हैं। कहते हैं, शेरनी के बच्चा होता है तो किसी को कानोकान खबर नहीं होती और बच्चे बाहर चहल कदमी करने लगते हैं तो अखबारों में फोटो छपते हैं। लेकिन मुर्गी एक अंडा देती है तो आसमान सिर पर उठा लेती है! कांग्रेस को अपने घर के भीतर बहुत कुछ ठीक करना होगा।

  • त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार व समीक्षक)

ये भी पढ़ेंः Rajasthan Congress: नए जिलाध्यक्षों पर सवाल, बवाल और कांग्रेस का हाल

इसे भी पढ़िएः Congress: राजस्थान कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की जंग, गुटबाजी ज्यादा बढ़ने के आसार

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