– निरंजन परिहार
BJP: संसार की सबसे बड़ी पार्टी सन्न है। क्योंकि युवा मन बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस माहौल को पढ़ लिया है और अमित शाह को आभास है। बीजेपी (BJP) के बड़े नेता भी जान रहे हैं कि भरोसा भरभरा रहा है। संगठन चरमरा रहा है। समझ आ रहा है कि युवा जाग रहा है। पहले जेन-जी आंदोलन के सामने सरकार की हार। फिर बांकीपुर और विदशा में पार्टी को मात। कार्यकर्ता कसमसा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के प्रति उसके मन में आदर तो है, लेकिन 12 साल में उसे क्या मिला। कब तक दरियां बिछाएंगे। कब तक नारे लगाएंगे। हर तरफ विकास है। लेकिन कब तक दूसरों का विकास देखते रहेंगे। बाहर से आने वालों को बहुत सम्मान मिल रहा है। अपने ही कब तक समामान को तरसते रहेंगे। कसमसाहट इसी बात की है। मंत्रियों के लिए भीड़ जुटाई, मुख्यमंत्रियों के लिए कुर्सियां लगाई, लेकिन सम्मान तक नहीं। कार्यकर्ता आखिर और कब तक अच्छे दिनों की उम्मीद करता रहेगा।
सिर्फ वोट कम नहीं हुए, भरोसा भी कम हुआ
पीएम मोदी को जब जंतर मंतर पर खुले आम गालियां बकी जा रही थीं, तो बीजेपी अवाक थी और कार्यकर्ता मौन। जेन-जी आंदोलन में सरकार मुद्दा ही नहीं समझ पाई। देश याद रखेगा कि संसार में सबसे बड़े सूरमा बनने के अश्वमेघ पर निकले एक विराट कद के अपने ही नेता के खिलाफ जब शर्मनाक बकवास की जा रही थी, तो संसार की सबसे बड़ी पार्टी के सभी नेता मौन थे। न संगठन और न ही सरकार, माहौल नहीं पढ़ पाई। नब्ज तक नहीं पकड़ पाई। राजनीति में यही सबसे महंगी भूल होती है। सियासत में विरोधी जितना नुकसान नहीं पहुंचाते। अपनों की चुप्पी उससे कहीं ज्यादा चोट करती है। बात बांकीपुर और विदिशा की भी। दोनों बीजेपी के मजबूत किले। बांकीपुर में तो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और उनके पिता की तीस साल में कुल 9 बार लगातार जीत का इतिहास। लेकिन किला केवल बीस दिन में ढहा दिया, वह भी एक अकेले निहत्थे प्रशांत किशोर ने। विदिशा में भी बीजेपी हार गई। क्योंकि सिर्फ वोट कम नहीं हुए। भरोसा भी कम हुआ है। कार्यकर्ता भी बेदम हुआ है। बीजेपी के आराध्य अटल बिहारी बाजपेयी और दिग्गज सुषमा स्वराज जैसे कद्दावर नेता विदिशा से सांसद रहे। शिवराज सिंह चौहान वहीं से सांसद और केंद्र में मंत्री भी, उससे पहले 15 साल तक मुख्यमंत्री। लेकिन फिर भी करारी हार।
सत्ता और संगठन दोनों के समीकरण में बदलाव
जंतर – मंतर की से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में निकले अपशब्द हमारे हिंदुस्तान की हवाओं में बरसों बरस तैरते रहेंगे। बीजेपी के बड़े चेहरों के परिवारजनों की भी जेन-जी आंदोलन के समर्थन में सार्वजनिक गतिविधियों को लेकर चर्चाएं हैं। संदेश गलत गया। राजनीति में संदेश ही सबसे बड़ा सच होता है। नीचे कार्यकर्ता बेचैन। मगर, ऊपर नेता आश्वस्त ही नहीं लगभग अहंकार में। यही फासला बड़े खतरों के फैसले करता है। दिल्ली ने कार्यकर्ता के संकेत पढ़ लिए हैं। संकेत साफ है कि कोई तंबू अगर अपने बंबुओं का का ही खयाल नहीं रखता है तो उसका उखड़ना तय है। तंबू की तान ढीली पड़ रही है। इसलिए, अब सिर्फ समीक्षा नहीं। सत्ता और संगठन दोनों के समीकरण बदलेंगे। दिग्गजों ने भांप लिया है कि यह चर्चा नहीं, फैसलों का वक्त हैं। मंत्रियों की रिपोर्टें खुल चुकी हैं। मुख्यमंत्रियों की फाइलें सामने हैं। राज्यों का हिसाब हो रहा है। सरकारों का वजन तौला जा रहा है। संगठन की नब्ज भी टटोली जा रही है। कोई नहीं बचेगा।
कई मंत्रियों मुख्यमंत्रियों और प्रदेश अध्यक्षों पर तलवार
बदलेगा, बहुत कुछ बदलेगा। तैयारी पक्की है। इस बार कुर्सी का वजन नहीं। काम का वजन होगा। चेहरे की चमक नहीं, कार्यकर्ता की बात बोलेगी। किसी बड़े नेता की सिफारिश नहीं, जनता की राय चलेगी। दिल्ली की भाषा में इसे परफॉर्मेंस कहते हैं। और राजनीति की भाषा में अस्तित्व की लड़ाई। महाराष्ट्र की चर्चा सबसे भारी है। राजस्थान और मध्य प्रदेश की भी बारी है। सवाल केंद्र के मंत्रियों पर भी हैं। सवाल संगठन पर भी हैं। सवाल तालमेल पर भी हैं। और सबसे बड़ा सवाल यह कि सत्ता का पहिया घूम रहा है, मगर कार्यकर्ता वहीं खड़ा हैं। केंद्र के कई मंत्री भी निशाने पर हैं और कुछ मुख्यमंत्री भी। देवेंद्र फडणवीस के समर्थक चर्चा से पहले ही अतिनिश्चिंतता दिखा रहे हैं। पर्ची मुख्यमंत्री के विशेषण से विख्यात भजनलाल शर्मा और जमीन खरीदी मामले से कुख्यात मध्य प्रदेश के मोहन यादव की भी चर्चा है। चर्चा होनी भी चाहिए, क्योंकि तीनों ही प्रदेशों में सरकार ने संगठन को क्या दिया, यही चिंता का विषय है। लेकिन बीजेपी की राजनीति में अंतिम सूची छपने तक कोई नाम स्थायी नहीं होता। यह पार्टी चौंकाने के लिए जानी जाती है। मगर अब खुद चौंक रही है, यह भी सच है।
बहुत कुछ और नया करने की कोशिश में है बीजेपी
प्रदेशों के संगठन भी सवालों के घेरे में है। अब केवल केंद्रीय कार्यालय से आदेशों के अनुरूप आयोजनों से बात नहीं बनेगी। बूथ जिंदा है या नहीं। कार्यकर्ता मुस्कुरा रहा है या नहीं। मंडल मजबूत है या नहीं और जिले में जलवा किसका है। समाज के नए वर्ग जुड़ रहे हैं या नहीं। दिल्ली इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती रही है। लेकिन अब बहुत कुछ और नया करने की फिराक में है। अब ‘भाई साहबों’ की सिफारिश पर भी लगाम संभव है और संगठन के सांडों पर भी नकेल तय है। लंबे समय तक सत्ता में रहने की सबसे बड़ी बीमारी यही होती है कि आत्मविश्वास धीरे-धीरे अहंकार में बदलने लगता है। नेता समझने लगते हैं कि चुनाव जनता नहीं, चेहरे जिताते हैं। फिर कार्यकर्ता केवल पोस्टर लगाने वाला बन जाता है। फिर संगठन फाइलों में सिमट जाता है। और तब जनता एक दिन बैलेट ईवीएम का बटन दबाकर बता देती है कि मालिक कौन है। बांकीपुर और विदिशा से वोटों के नए मालिक निकले है।
जब कार्यकर्ता बोलना छोड़ दे, तो मतदाता बोलता है
दिल्ली समझ रही है कि जिस दिन कार्यकर्ता बोलना छोड़ दे और मतदाता बोलना शुरू कर दे, उसी दिन राजनीति का मौसम बदल जाता है। अब केवल मरम्मत से काम नहीं चलेगा। मशीन को खोलना पड़ेगा। सफाई करनी पड़ेगी। पुर्जे बदलने पड़ें और मशीन चलाने वाले चेहरे भी। लेकिन बीजेपी अपने फैसले प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं बताती। निर्णय सिर्फ दो लोगों के दिलों में होते हैं, फिर प्रत्यक्ष तौर पर प्रकट होते हैं। राजनीति का एक पुराना नियम है कि जब संघर्षों से निपटना आसान नहीं लगे, तो झुक जाइए। इसीलिए, जो अब तक किसी के सामने नहीं झुका, वह गालीबाजों के सामने झुक गया। राजनीति का दूसरा नियम है कि संघर्ष जब कठिन हो जाए, तो सैनिक, सेनापति और संगठन सहित रणनीति और राज करने के तरीके, सारे बदल दीजिए। बीजेपी यही करना तय कर चुकी है, क्योंकि समीकरणों को साधने के लिए सेना संगठित और सत्ता संरक्षित होनी चाहिए। बाहर बहुत कुछ बदल गया है, इसलिए बीजेपी में भी बहुत कुछ बदलने वाला है! धुआं उठ गया है, और जब दिल्ली में लगातार धुआं दिखाई देने लगे, तो समझ लीजिए… महायज्ञ शुरू हो चुका है, जिसमें बहुत स्वाहा होना है, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो सत्ता का स्वाहा होना तय है। प्रतीक्षा कीजिए, तस्वीर बदलने ही वाली है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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