Narendra Modi Cabinet: देश की राजधानी के सियासी आकाश में अजब सी आहट है। सत्ता सन्न है और मंत्री मौन। नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार के किसी भी कार्यकाल में ऐसा सन्नाटा कभी नहीं देखा गया। अगले लोकसभा चुनाव में केवल ढाई साल बचे हैं। विपक्ष पहले से ज्यादा हावी है और जनता का मूड भी कुछ अनमना सा। युवा पीढ़ी मोदी के मुरीद के रूप में विख्यात थी, उसका एक वर्ग अब कुख्यात है। सत्ता को सरे आम गालियां बकी जा रही है। युवा वर्ग के समर्थन से दो आम चुनावों में मोदी मदमस्त होकर मतवाली चाल में विपक्ष को रोंदते चले गए थे, वही युवा तीसरे कार्यकाल में सीधे सवाल करने लगा है। इस बीच, केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Ministry) में फेरबदल की चर्चा है। बीजेपी (BJP) ने अपने केंद्रीय संगठन को बदल दिया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन की नई टीम के 65 पदाधिकारियों में 51 नए चेहरे हैं, ज्यादातर युवा। इसे नई पीढ़ी को अधिक स्थान देने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल है कि क्या 2029 की लड़ाई उसी राजनीतिक टीम के साथ लड़ी जाएगी, जिसने 2014 और 2019 की बीजेपी को संभाला था, या बीजेपी के राष्ट्रीय टीम की तरह, पीएम मोदी सरकार (Narendra Modi Cabinet) भी अपनी नई टीम बनाएंगे, जो अगले दशक की बीजेपी का चेहरा बनेगी?

माहौल बदला, तो बहुत कुछ और भी बदलेगा
नरेंद्र मोदी सरकार तीसरे कार्यकाल के उत्तरार्ध में प्रवेश कर चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने बीजेपी को यह संदेश दे दिया था कि 2014 और 2019 वाली परिस्थितियां बदल गई हैं। मोदी सरकार की अटल, अविचल और अपराजेय छवि को ‘कॉक्रोच गैंग’ ने तिरोहित किया है। गैंग इसलिए, क्योंकि कॉक्रोच कोई राजनीतिक दल न होकर भी राजनीतिमें दबदबा बनाने की कोशिश में है। जंतर – मंतर डरा रहा है। संकट विकट है और चुनाव निकट है। संकेत साफ है कि संगठन संवारने, सत्ता के भीतर नए चेहरों की सक्रियता बढ़ाने, नेताओं को नई जिम्मेदारी देने में चुनावी रणनीति की नई प्राथमिकताएं गढ़ी जा रही है और भविष्य की तस्वीर पढ़ी जा रही हैं। बीजेपी भले ही सत्ता में है और नरेंद्र मोदी भले ही अब भी सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा हैं, लेकिन चुनावी मैदान पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो चुका है। विपक्ष आक्रामक है, क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ी है और मतदाता पहले की तुलना में अधिक तीखे सवाल पूछ रहा है।
गडकरी के बयान से उठी बदलाव की अटकलें
मोदी मंत्रिमंडल में बदलाव की चर्चा को सबसे ज्यादा हवा नितिन गडकरी के बयान से मिली। गड़करी ने था कि अब वह पहले जितना काम नहीं कर पाते और नई पीढ़ी को जिम्मेदारी देने का समय आ गया है। गड़करी के इस बयान को राजनीति के गलियारों में मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्यों के भविष्य से जोड़कर देखा गया। क्योंकि इसी समय बीजेपी में संगठनात्मक स्तर पर एक बहुत बड़ा पीढ़ीगत बदलाव हुआ, इसलिए उनके बयान ने राजनीतिक अटकलों को अतिरिक्त ईंधन दिया। राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और निर्मला सीतारमण मोदी सरकार के महत्वपूर्ण और अनुभवी चेहरे हैं। राजनाथ सिंह बीजेपी की उस पीढ़ी के नेता हैं जिसने पार्टी के संगठनात्मक विस्तार से लेकर केंद्र की सत्ता तक का लंबा दौर देखा है। राजनाथ और गडकरी दोनों, दो – दो बार राष्ट्रीय अध्यक्ष और लगातार तीसरे कार्यकाल में मंत्री हैं। निर्मला सीतारमण भी वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग संभाल रही हैं। ऐसे में, मंत्रिमंडल में बदलाव की किसी भी संभावित योजना को केवल ‘कौन जाएगा’ के सवाल से नहीं देखा जा सकता। ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल होगा कि किसे किस जिम्मेदारी के साथ आगे लाया जाएगा?
जंतर-मंतर ने बहुत कुछ बदल दिया राजनीति में
देश ने देखा कि जंतर-मंतर का युवा आंदोलन रोजगार और युवाओं की व्यापक बेचैनी का प्रतीक बना। राजनीतिक रणनीतिकार अमिताभ तिवारी का कहना है कि भले ही युवा नाराज है, और विपक्ष हावी। लेकिन इसका राजनीतिक लाभ विपक्ष को तभी मिल सकता है, जब वह इस असंतोष को ठोस राजनीतिक विकल्प और नीतिगत समाधान में बदल सके। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि जंतर-मंतर पर हुए युवा प्रदर्शन में युवा वर्ग की गालियों भरी बकवास को केंद्र सरकार ने भले ही गंभीरता से लिया, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा युवा मतदाता सरकार के खिलाफ हो गया है। परिहार मानते हैं कि इस आंदोलन से यह जरूर स्पष्ट हुआ कि युवाओं के रोजगार, शिक्षा और भर्ती से जुड़े सवाल अब केवल प्रशासनिक मुद्दे नहीं रहकर राजनीतिक की मुख्यधारा के मुद्दे बन चुके हैं। निरंजन परिहार यह भी मानते हैं कि सरकार विरोधी नाराजगी अपने आप चुनावी वोट में परिवर्तित नहीं होती। फिर, बीजेपी और सरकार भी अपनी उपलब्धियों का प्रचार करने के साथ साथ नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझकर आगे बढ़ने की राह पर दिख रही है।

दिग्गजों को दरकिनार करना आसान नहीं
देश के वर्तमान हालात से निपटने की राह केवल केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल से ही आसान नहीं होगी। वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल ने केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल को आसान प्रक्रिया नहीं बताया। रावल के अनुसार नेतृत्व के सामने वरिष्ठ मंत्रियों से जुड़े बदलावों को लेकर प्रतिरोध और राजनीतिक कठिनाइयां भी हैं। वरिष्ठ पत्रकार रावल की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी मंत्रिमंडल का पुनर्गठन प्रधानमंत्री की इच्छा भर से नहीं होता। उसमें संगठन, राज्यों के समीकरण, सहयोगी दलों, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, जातीय – सामाजिक संतुलन और मंत्रियों की राजनीतिक उपयोगिता आदि सभी का हिसाब शामिल होता है। हालांकि राजनाथ, गडकरी और सीतारमण जैसे दिग्गज नेताओं के अलावा शिवराज सिंह चौहान, मनोहर लाल खट्टर, प्रल्हाद जोशी, गिरिराज सिंह, गजेंद्र सिंह शेखावत, मनसुख मांडविया, अर्जुन राम मेघवाल, जीतन राम मांझी और कुछ अन्य नेताओं के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि एक साथ कई सारे नामी, प्रतिष्ठित और दिग्गजों को दरकिनार करके राजनीति में बदलाव किया जाना संभव नहीं होता। परिहार कहते हैं कि बदलाव होगा भी, तो पूर्ण पीढ़ीगत विस्थापन के बजाय चरणबद्ध संतुलन होगा, और ज्यादा बदलाव 2029 में अगर सरकार बनी, तो उसमें दिख सकता है।
मोदी की प्राथमिकता पीढ़ीगत परिवर्तन की नहीं
मंत्रिमंडल में फेरबदल के मामले में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने सबसे कठिन चुनौती यही होगी कि अनुभव और नई ऊर्जा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। प्रदीप सिंह जैसे देश के ख्यातिप्राप्त राजनीतिक टिप्पणीकार के मुताबिक मंत्रिमंडल में फेरबदल की इस व्यापक बहस में संभावित तस्वीर स्पष्ट और सत्यापित नहीं है। प्रदीप सिंह कहते हैं कि राजनाथ, गडकरी या निर्मला सीतारामन जैसे वरिष्ठ मंत्रिमंडलीय सदस्यों के बारे में कोई भी अटकल लगाना आसान नहीं है। इतने बड़े नेताओं को अचानक किनारे करना राजनीतिक रूप से जोखिमपूर्ण हो सकता है। दूसरी ओर, सिंह यह भी कहते हैं कि केवल पुराने चेहरों पर निर्भर रहना उस पीढ़ीगत बदलाव को टालना होगा, जिसकी चर्चा बीजेपी के संगठनात्मक बदलाव के बाद तेज हुई है। वैसे तो, फिलहाल केवल फुसफुसाहट है, फैसला नहीं। लेकिन राजनीति में कई बार फुसफुसाहट ही आने वाले फैसले की पहली भूमिका लिखती है।
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राकेश दुबे / संदीप शुक्ल
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