Rajasthan: राजनीति में कुछ व्यक्तित्व केवल पदों से नहीं, अपने बौद्धिक ताप, सांस्कृतिक गहराई और मनुष्यता की चौड़ाई से पहचाने जाते हैं। राजस्थान (Rajasthan) की राजनीति में जसवंत सिंह (Jaswant Singh) ऐसे ही विरल नेताओं में थे। उनमें एक सामंती संस्कार की छाया अवश्य थी, पर उसी के भीतर एक अद्भुत मानवीय विस्तार था। वे उन दुर्लभ भारतीय राजनेताओं में थे, जिनके लिए राष्ट्रवाद हमारी मनुष्यता का प्रतिपक्ष नहीं था; जिनकी राजनीतिक दृष्टि इतनी व्यापक थी कि दो देशों, दो धर्मों और दो स्मृतियों के बीच खड़ी दीवारें भी उन्हें अंतिम सत्य नहीं लगती थीं। राजस्थान के लोकधर्म, मर्यादा, शौर्य और सह-अस्तित्व की जो जटिल परंपरा करणी माता से हिंगलाज तक के सांस्कृतिक भूगोल में फैली है, जसवंतसिंह उसके एक सधे हुए, गहरे और मर्मज्ञ ज्ञाता थे। और मानवेंद्र सिंह जसोल (Manvendra Singh Jasol) उन्हीं जसवंत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र हैं। इतिहास हमें बार-बार बताता है कि बड़े राजनीतिक व्यक्तित्व केवल चुनावी गणित से नहीं बनते; वे अपने समय की मानसिक संरचनाओं को भी बदलते हैं। राजस्थान की सत्ता-रचना, नेतृत्व-परंपरा और वैचारिक दिशा को समझना हो तो जसवंतसिंह की भूमिका को सतही ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि उन्होंने उस राजनीतिक वातावरण के निर्माण में भूमिका निभाई, जिसमें आगे चलकर भैरोंसिंह शेखावत (Bhairon Singh Shekhawat) और वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) जैसे नेताओं की संभावनाएँ आकार ग्रहण कर सकीं। राजनीति में कुछ लोग मंच पर दिखते हैं, कुछ मंच की रोशनी की दिशा तय करते हैं। जसवंतसिंह दूसरी श्रेणी के भी बड़े राजनीतिक शिल्पकार थे।
बड़े पिता की विरासत एक वरदान कम और बोझ अधिक
इतिहास का एक नियम बहुत निर्मम है। व्यक्तित्व की ऊँचाई वंशानुगत नहीं होती। पुत्र प्रतिभाशाली हो सकता है, वाक्पटु हो सकता है, सांस्कृतिक रूप से आकर्षक हो सकता है, पर राजनीति केवल प्रतिभा से नहीं चलती; वह धैर्य, समय-बोध, प्रतीक्षा, अपमान सहने की क्षमता और सही क्षण पर सही निर्णय लेने की कला भी मांगती है। मानवेंद्रसिंह में चमक थी, पहचान थी, एक क्षेत्रीय-आकर्षक व्यक्तित्व भी था। पर सियासत की अपनी सुरलिपि होती है। उसमें केवल स्वर नहीं, विराम भी गिनते हैं; केवल साहस नहीं, संयम भी काम आता है। कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति सार्वजनिक जीवन के लिए योग्य दिखता है, पर उसके भीतर का मन उस कठोर अनुशासन के लिए बना ही नहीं होता जिसकी राजनीति मांग करती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो बड़े पिता की विरासत एक वरदान कम, बोझ अधिक बन जाती है। इस मानसिकता और मन:स्थिति के एक शिकार वैभव गहलोत भी हैं, जो इतने शालीन और सहृदय होकर भी अपने पिता के नभस्पर्शी व्यक्तित्व के कारण किसी को नज़र नहीं आ रहे। वजह ये पुत्र से केवल सफलता नहीं, तुलना भी चिपकी रहती है। वह स्वयं के रूप में नहीं, किसी महान छाया के विस्तार के रूप में देखा जाता है। ऐसे में उसके निर्णय अक्सर आत्मनिर्भर नहीं रह जाते; वे प्रतिक्रिया, असुरक्षा, मान-अपमान और स्वीकार्यता की बेचैनी से संचालित होने लगते हैं। समाजशास्त्र इसे “वंशानुगत प्रतिष्ठा का दबाव” कह सकता है। राजनीति में यह दबाव और अधिक क्रूर हो जाता है, क्योंकि वहाँ व्यक्ति का हर कदम निजी नहीं रह जाता; वह तुरंत प्रतीक में बदल दिया जाता है।

जसवंत पुत्र प्रतिभाशाली, मगर सियासत में वैसे फिट नहीं
जसवंतसिंह के रहते हुए उनके पुत्र मानवेंद्रसिंह न केवल मीडिया के प्रमुख हस्ताक्षरों में रहे, वे राजनीति में भी बहुत चमके। वे बाड़मेरी धोती और वहाँ की खास पगड़ी वाली वेशभूषा में दिखते। एक युवा पुत्र तो परंपरागत वेश में था और एक प्रौढ़ पिता सदैव आधुनिक फौजी वस्त्रों में। भाषा और शैली में पुत्र आधुनिक; लेकिन पिता खांटी देसी अंदाज़ वाला डायलेक्ट रखते हुए। लेकिन सियासत की सुरावली कुछ अलग ही होती है। उसके आलाप-तान और आरोह अवरोह और सप्तक और शुद्ध और विकृत स्वरों का अपना श्रुतिमंडल होता है। वह हर किसी के बस की बात नहीं। जसवंतसिंह के पुत्र बेहद प्रतिभाशाली होकर भी सियासत में वैसे फिट नहीं हुए, जैसे पिता थे। और न जाने वे कैसे-कैसे ग़लत फै़सले एक के बाद एक करते रहे। जसवंतसिंह ने जिस पार्टी के आंतरिक निर्माण के लिए इतना कुछ किया, उन्हें उसी दल ने बहुत ही अपमानकारी तरीके से बाहर कर दिया। उन्हें उनके मानवतावादी और लोकहितैषी होने की सज़ा मिली। उन्हें राजस्थान की संस्कृति में उस पंरपरा का होने की यातना दी गई, जो करणी माता से हिंगलाज माता के बीच के भूगोल में एक व्यापक इन्सानियत रचती है। वे बहुत संतापों के बीच गए। सियासत का जो समय-चक्र घूमा, उसमें अकेले जसवंतसिंह ही नहीं, जाने कितने अच्छे लोगों को आविर्भाव से तिरोभाव में जाना पड़ा। और उनके जाने के बाद उनके पुत्र मानवेंद्रसिंह ने सियासत में अपने उखड़े पाँव जमाने की कोशिश की। वे किसी दोस्त के कारण कांग्रेस में आए तो उन्हें वसुंधरा राजे जैसी दिग्गज नेता के ख़िलाफ़ खड़ा करवा दिया गया। सबको सांगोपांग पता था कि झालावाड़ में उनका क्या होना है।
ऐसा कहां नहीं होता कि परिवार में झगड़े और विवाद न हों
कांग्रेस की समस्या यह है कि उसमें बाहर से आया अच्छे से अच्छा नेता भी हाशिए पर कर दिया जाता है और भाजपा इतनी कुशल है कि कांग्रेस से आया बुरे से बुरा आदमी भी सलीके से इस्तेमाल किया जाता है। कांग्रेस में जाने कौनसा कैटेलिस्ट है, जो अपनी ही नई प्रतिभाओं को खड़े होने में तानपूरे से तार बनाकर दम लेता है। वह बांसुरी हो तो उसे एक छेद भर रहने देता है। और भाजपा उस छेद को बांसुरी की तरह फूंकती रहती है भले वह बहुत बेसुरी ही बजे। वह एक तार का तानपूरा भले न बना पाए; लेकिन वह उसे पंजाब की तूंबी की तरह बजा ही लेती है। मानवेंद्र सिंह ने इस बदमजा सियासी जीवन से राहत पाने के लिए घर वापसी की; लेकिन हालात कुछ ही और रहे। बेटे के विवाह के उपरांत अब जो प्रकरण हुआ है, वह राजस्थान की “धूड़-धाणी राख झाणी” वाली उक्ति को चरितार्थ करता है; लेकिन अफ़सोस है मीडिया और समाज पर कि हम अब भी उस आदिम युग में जी रहे हैं, जहाँ न मानवीय संवेदनाओं से कोई सरोकार है और न ही निजता की रक्षा की कोई राह। ऐसा कहाँ नहीं होता कि परिवार में झगड़े और विवाद न हों। किसके यहाँ नही होता? कौन गलतियां नहीं करता। कई बार तो परिवार का सबसे समझदार आदमी ही ऐसी मूर्खता कर बैठता है कि वह कोई बच्चा भी नहीं करता। यह हम सबके परिवारों में होता है।लेकिन अगर पुत्र के विवाह के बाद मानवेंद्रसिंह ने किसी से ग़लत या सही रिश्ता गांठ लिया तो उसके अच्छे बुरे के भागीदार वे ख़ुद हैं। इसमें कहां मीडिया आ गया? अगर यह विषय मीडिया या समाज का है तो ये साहसी उस समय कहाँ थे जब एक नेता अपनी पत्नियों को छोड़ देते हैं और दूसरों की पत्नियों को घरों में रख लेते हैं। क्या ऐसे किस्सों की लंबी फ़ेहरिस्त नहीं है? लेकिन मजाल है कि वहाँ कोई एक शब्द भी बोल दे!

इतिहास में मर्यादा और इच्छा का यह द्वंद्व नया नहीं
दरअसल, यहीं से हमारी असली चिंता शुरू होती है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति का सार्वजनिक आचरण आलोचना का विषय हो सकता है; लेकिन उसके पारिवारिक, वैवाहिक, भावनात्मक या निजी संबंधों को मीडिया और सोशल मीडिया का सामूहिक तमाशे में बदल देना सभ्य समाज का लक्षण नहीं है। यह केवल पत्रकारिता की मर्यादा का ह्रास नहीं, मनुष्यता की भी विफलता है। परिवारों में तनाव होते हैं, रिश्तों में दरारें आती हैं, अकेलापन मनुष्य को नए संबंधों की ओर ले जाता है और जीवन के उत्तरार्ध में लोग अपने ढंग से अर्थ और सहारा खोजते हैं। यह सब मानव-अनुभव का हिस्सा है, मीडिया-उत्सव का नहीं। अभी हमने देखा कि एक पार्टी ने सार्वजनिक मर्यादाओं को अपने यौन कदाचार से लांछित करने वाले नेताओं को अपने कलेजे से लगाया है। लेकिन मैंने तो उन पर कहीं टिप्पणी नहीं देखी। इतिहास में मर्यादा और इच्छा का यह द्वंद्व नया नहीं है। मारवाड़ की लोककथाएँ इसी तनाव से भरी पड़ी हैं। लेकिन यह चर्चा अगर उस मारवाड़ में हो तो और भी हैरानीजनक है, जहाँ लोककथाओं में पहले से मर्यादाओं के बारे में बहुत खुलकर बताया गया है। जैसलमेरे के राजा लूणकरण के यहाँ भारमली राजकुमारी उमा-दे के साथ बेटी की तरह पली। उमा-दे का विवाह जोधपुर के राजा राव मालदेव के साथ हुआ तो भारमली दासी के रूप में साथ आई। राजा सुहागरात के लिए आए तो भारमली पर रीझ गए और रानी उमा दे शृंगार करती ही रह गईं। उमा दे को पता चला तो वह सेज पर जाने के बजाय अपने पिता के घर लौट आईं। कामातुर राजा को जब अपने राजसी संस्कारों का बोध हुआ तो उन्होंने महान् कवि ईसरदास के काका आशाजी को उन्हें वापस लाने और मनाने भेजा। यह कहानी कई तरह कही जाती है, लेकिन सार ये है कि जब आशाजी ने उन्हें वापस चलने के लिए कहा तो उमा दे ने कहा कि अगर मेरी जगह आपकी बेटी होती तो आप क्या कहते। इस पर आशाजी बारहठ ने कहा : मान रखै तो पीव तज, पीव रखै तो मान। दो दो गयंद न बंधहि, एकै ही कंबूठाण। … कि तुम्हें आत्मसम्मान चाहिए तो प्रिय को तज दे और प्रिय चाहिए तो आत्मसम्मान। आत्मसम्मान भी एक तरह का हाथी ही होता है, जिसे हर कोई नहीं पाल सकता। और हाथी तो हाथी होता ही है।
निजता को अपराध मान लेना समाज का नैतिक पतन
उमा दे और भारमली की कथा इसलिए बची रही कि उसमें केवल राजसी प्रसंग नहीं, मान, प्रेम, अपमान और विकल्प का गहरा मानवीय संघर्ष दर्ज है। “मान रखै तो पीव तज, पीव रखै तो मान” यह पंक्ति केवल नैतिक शिक्षा नहीं, मानव-स्थितियों की त्रासदी का संक्षेप है। हर युग में मनुष्य इन्हीं दो ध्रुवों के बीच फँसा रहा है : आत्मसम्मान और आत्मीयता। फर्क बस इतना है कि पहले लोककथा इसे करुणा के साथ कहती थी, आज मीडिया उसे कुतूहल और उपहास के साथ कहता है। यही हमारे समय का नैतिक पतन है। हमने निजता को अपराध की तरह और गपशप को जनहित की तरह बरतना शुरू कर दिया है। किसी विधुर व्यक्ति के निजी संबंध, उसके पारिवारिक समीकरण, उसकी व्यक्तिगत पसंद या भूल आदि ये सब सबसे पहले उसी व्यक्ति, उसके परिवार और उसकी अंतरात्मा के दायरे के विषय हैं। समाज को हर बात पर फैसला सुनाने का अधिकार किसने दिया? और मीडिया, जो स्वयं अपने भीतर असंख्य अपारदर्शिताएँ छिपाए बैठा है, वह दूसरों की निजता का दरोगा क्यों बना फिरता है? जसवंतसिंह के जीवन से हमें राजनीति का एक ऊँचा पाठ मिलता है; मानवेंद्रसिंह के प्रसंग से हमें समाज का एक कठिन पाठ मिलना चाहिए। पहला पाठ यह कि लोकधर्म का अर्थ केवल सत्ता नहीं, मनुष्यता है। दूसरा यह कि किसी परिवार की पीड़ा, द्वंद्व, ग़लती या निजी उलझन को सार्वजनिक अपमान में बदल देना सामाजिक क्रूरता है। राजस्थान की धूल बहुत कुछ ढँकती भी है, बहुत कुछ बचाती भी है। पर हमने अब धूल को भी सनसनी में बदल दिया है।

निजी ज़िंदगी पर धावा, स्वस्थ समाज की नैतिक पराजय
अंततः मूल सिद्धांत बहुत स्पष्ट है। किसी व्यक्ति की राजनीति से असहमति हो सकती है, उसके सार्वजनिक निर्णयों की कठोर आलोचना भी की जा सकती है, उसके विचारों का प्रतिवाद भी लोकतांत्रिक अधिकार है; किंतु उसकी निजी ज़िंदगी पर धावा बोलना किसी भी स्वस्थ समाज की नैतिक पराजय है। निजता पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं होता, वह नागरिक गरिमा, मानवीय मर्यादा और सभ्यता के आधारभूत संस्कार पर हमला होता है। जिस क्षण मीडिया जनहित और जनकुतूहल के बीच का फ़र्क भूलने लगता है, उसी क्षण वह लोकमाध्यम न रहकर ताक-झाँक की मशीन में बदल जाता है। और जो समाज इस फ़र्क को मिटा देता है, वह संवादशील समाज नहीं रह जाता; वह धीरे-धीरे झाँकने, ठठाने, उकसाने और अपमान को मनोरंजन में बदल देने वाली भीड़ में बदलने लगता है। विडंबना यह है कि हमारी नई पीढ़ी, कुल मिलाकर, इस प्रश्न पर पहले की तुलना में अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक नैतिक दिखती है। वह निजता को केवल “छिपाने” का अधिकार नहीं, अपनी अस्मिता, मानसिक सुरक्षा और आत्मसम्मान की अनिवार्य शर्त के रूप में समझती है। वह यह जानती है कि हर सार्वजनिक चेहरा अपनी संपूर्ण मनुष्यता में सार्वजनिक संपत्ति नहीं बन जाता। लेकिन इसी पीढ़ी के भीतर, डिजिटल शोर, वायरल संस्कृति और क्लिक-आधारित मान्यता की अंधी दौड़ ने एक ख़तरनाक़ प्रवृत्ति भी पैदा की है, जहाँ संवेदना की जगह सनसनी और समझ की जगह त्वरित निर्णय लेने की आदत बढ़ती जा रही है। नए लोग भी उसी बहाव में बहते दिखते हैं, जिसमें किसी की निजी विफलता, पारिवारिक तनाव, भावनात्मक उलझन या संबंधों की जटिलता को सार्वजनिक उपभोग की वस्तु बना दिया जाता है।
क्या समाज सचमुच अपनी सभ्यता खोता जा रहा है
सबसे गहरी चिंता यहाँ और बढ़ जाती है, क्योंकि यह विषाक्तता केवल पुरुष-प्रधान मीडिया-भाषा तक सीमित नहीं रही। दु:ख, कष्ट और तक़लीफ़ इस बात की है कि यूट्यूब और डिजिटल मीडिया में अपनी जगह बना रही युवा महिला रिपोर्टर भी उसी अश्लील, आक्रामक और निजता-भंजक संचार-संस्कृति का शिकार होती जा रही हैं, जिसे लंबे समय तक पुरुषों ने गढ़ा, पोसा और सामान्य बनाया। वे कई बार अनजाने में उसी भाषा, उसी भंगिमा, उसी शिकारी उत्सुकता और उसी नैतिक असंवेदनशीलता को दुहराने लगती हैं, जिसने पत्रकारिता को मानवीय पेशा नहीं, सार्वजनिक चीर-फाड़ का मंच बना दिया। इस प्रकरण में अगर सही में देखें तो सारा प्रहार पुरुष पर नहीं, उन महिलाओं पर हो रहा है, जिनका अपना कोई कुसूर नहीं। इसलिए यह केवल पेशेगत विचलन नहीं, संचार-जगत में बैठे पितृसत्तात्मक प्रशिक्षण की गहरी फूहड़ क़ामयाबी है, जहाँ स्त्री की उपस्थिति तो नई लगती है, पर भाषा अब भी पुरानी हिंसा से संचालित होती है। पत्रकारिता का धर्म किसी के जीवन के बंद दरवाज़ों पर लात मारना नहीं, उन सवालों को उठाना है, जिनसे समाज बेहतर हो। मीडिया यदि मानवीय गरिमा का रक्षक नहीं बन सकता तो उसे कम-से-कम उसका भक्षक भी नहीं बनना चाहिए। निजता लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी आवश्यक शर्त है। जो मीडिया इसे नहीं समझता, वह अंततः सूचना का माध्यम नहीं, सामाजिक क्रूरता का औज़ार बन जाता है। इसे वे आम ग्रामीण लोग भी भली भांति जानते हैं कि कहाँ कहाँ क्या है। इसीलिए तो कहावत है कि कंदा चढ़-चढ़ देखो, घर-घर ओई लेखो! किसी भी घर की दीवार से झांककर देख लो, बहुत जगह ऐसा है। महान् साहित्यकार गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने कहा था : सभी इंसानों की तीन ज़िंदगी होती हैं: पब्लिक, प्राइवेट और सीक्रेट।” हम भी देखते हैं कि हमारे अपने आसपास ऐसा बहुत कुछ घटता है। सचमुच, किसी की निजता ख़बर नहीं, उसके मनुष्य होने की अंतिम शरणस्थली होती है। जो समाज इस शरण का सम्मान नहीं करता, वह अंततः अपनी ही सभ्यता खो देता है।
– त्रिभुवन (लेखक राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं)
(‘एक्स’ वॉल से साभार)
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