Republic Day: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (Droupadi Murmu) का गणतंत्र दिवस (Republic Day) की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन सामान्य औपचारिक वक्तव्य भर नहीं रहा। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह भाषण भारत (India) में लोकतंत्र की संस्थाओं, विशेष रूप से निर्वाचन आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच एक स्पष्ट और सधा हुआ संदेश लेकर आया। राष्ट्रपति ने चुनाव आयोग (Election Commission) की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर खुलकर विश्वास जताते हुए कहा कि उन्हें भरोसा है कि आयोग के प्रयासों से भारत के लोकतंत्र की प्रतिष्ठा निरंतर बढ़ती रहेगी। राजनीतिक हलकों में इसे विपक्ष, खासकर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) और कांग्रेस (Congress) द्वारा बार-बार लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ और चुनावी धांधली के आरोपों पर एक परोक्ष लेकिन सशक्त प्रहार के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, राष्ट्रपति का यह वक्तव्य महज औपचारिक प्रशंसा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक हस्तक्षेप जैसा है, जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा बनाए रखना है। यह भी महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रपति ने किसी दल या नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन संदर्भ इतने स्पष्ट थे कि संदेश अपने आप राजनीतिक बहस से जुड़ गया।
चुनाव आयोग पर भरोसा, संयोग या रणनीति?
राष्ट्रपति के भाषण की सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि इसमें विकास, विदेश नीति या सामाजिक योजनाओं की अपेक्षा मतदान, मतदाता और निर्वाचन व्यवस्था को केंद्र में रखा गया। यह चयन स्वयं में राजनीतिक संकेत देता है। ऐसे समय में जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सार्वजनिक मंचों से सवाल उठाए जा रहे हों, देश की संवैधानिक प्रमुख का लोकतांत्रिक संस्थाओं के पक्ष में खड़ा होना सत्ता-विपक्ष की बहस से ऊपर उठकर व्यवस्था के संरक्षण का संदेश देता है। राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में यह रेखांकित किया कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली की विश्वसनीयता का आधार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं। उनका यह कहना कि निर्वाचन आयोग के योगदान से भारत के लोकतंत्र की प्रतिष्ठा बढ़ी है, सीधे तौर पर उन आरोपों के विपरीत है जो हाल के महीनों में विपक्ष की ओर से सामने आए हैं। राहुल गांधी कई मंचों से यह आरोप लगाते रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया से छेड़छाड़ हो रही है और मतदाताओं के अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।
मतदाता और मतदान पर विपक्ष की भाषा का प्रतिवाद
राष्ट्रपति के भाषण में बार-बार मतदाता की भूमिका, मतदान के महत्व और लोकतांत्रिक भागीदारी की बात सामने आई। राजनीति विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि यह उस नैरेटिव के ठीक उलट है, जिसमें विपक्ष यह संकेत देने की कोशिश कर रहा है कि चुनावी प्रक्रिया ही संदिग्ध हो चुकी है। परिहार कहते हैं कि यदि मतदाता यह मानने लगे कि वोट का कोई मूल्य ही नहीं, तो लोकतंत्र की बुनियाद ही कमजोर होती है। राष्ट्रपति का जोर इस आशंका को संतुलित करने का प्रयास प्रतीत होता है। राष्ट्रपति का यह संदेश विशेष रूप से युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के लिए है, ताकि उनमें व्यवस्था के प्रति अविश्वास न पनपे। संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लोकतंत्र की जड़ों पर भरोसा जताना, अप्रत्यक्ष रूप से विपक्ष की आलोचनात्मक राजनीति को सीमित करता है। परिहार कहते हैं कि सत्ता पक्ष इसे लोकतंत्र की संस्थाओं के समर्थन के रूप में देख रहा है, जबकि विपक्ष इसे अप्रत्यक्ष आलोचना मान रहा है, लेकिन खुलकर कहने से बच रहा है।
संवैधानिक मर्यादा में खुलकर निकला राजनीतिक संदेश
राष्ट्रपति का पद दलगत राजनीति से ऊपर माना जाता है। वरिष्ठ पत्रकार संदीप सोनवलकर कहते हैं कि ऐसे में उनके भाषण को सरकार के पक्ष में बयान कहकर खारिज करना आसान नहीं है। यही कारण है कि विपक्ष के लिए यह स्थिति असहज है। कांग्रेस की राजनीति के जानकार सोनवलकर के अनुसार, राष्ट्रपति ने संवैधानिक मर्यादा का पालन करते हुए ऐसा संदेश दिया है, जिसे न तो खुले तौर पर चुनौती दी जा सकती है और न ही अनदेखा किया जा सकता है। यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति ने ‘लोकतंत्र की प्रतिष्ठा’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया। यह संकेत देता है कि लोकतंत्र को कमजोर बताने वाले आरोप अंततः भारत की वैश्विक छवि को भी प्रभावित करते हैं। इस संदर्भ में उनका वक्तव्य राष्ट्रीय हित और संवैधानिक जिम्मेदारी के दायरे में आता है। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि हाल के वर्षों में देखा गया है कि राष्ट्रपति के भाषणों को अक्सर औपचारिक माना जाता है, लेकिन इस बार संबोधन का राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट रूप से महसूस किया गया।
सत्ता और विपक्ष की राजनीति के बीच राष्ट्रपति का संतुलन
राष्ट्रपति ने हालांकि किसी विवाद में सीधे प्रवेश नहीं किया, लेकिन उनके शब्दों ने बहस की दिशा अवश्य तय कर दी। कुल मिलाकर, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिया गया भाषण लोकतंत्र के मूल स्तंभों—मतदाता, मतदान और निर्वाचन आयोग—के पक्ष में एक मजबूत संवैधानिक वक्तव्य है। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोपों के बीच व्यवस्था पर भरोसे की पुनर्स्थापना का प्रयास दिखाई देता है। यह भाषण न तो सीधा राजनीतिक हमला है और न ही तटस्थ चुप्पी—बल्कि लोकतंत्र की रक्षा में संवैधानिक संतुलन का उदाहरण है। आने वाले समय में यह संबोधन चुनावी बहसों में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु के रूप में उद्धृत किया जाता रहेगा।
-आकांक्षा कुमारी
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