Rajasthan: राजनीति में बयान कभी सिर्फ बयान नहीं होते। वह संकेत होते हैं। संदेश होते हैं और कई बार सीधे वार भी। लेकिन अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) राजनीति के धुरंधर रहे हैं। आम तौर पर वे सीधे वार नहीं करते। इस बार भी नहीं किया। सिर्फ बेटों के सत्ता में दखल की बात कही। पूर्व मुख्यमंत्री ने किसी का नाम नहीं लिया। सिर्फ सत्ता में बैठे लोगों के परिवारजनों के दखल की राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाया। गहलोत का यह बयान सिर्फ एक नैतिक अपील भर था। लेकिन राजस्थान (Rajasthan) की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी (BJP) ने इसे राजनीतिक प्रहार माना। उसी अनुपात में तड़प भी दिखी। गहलोत के किसी का नाम न लेने के बावजूद बीजेपी के कई तलवारें तातने लगे। और इसी से साफ हो गया कि गहलोत के बयान ने किस किस का नकाब नोचा। पूरे मुद्दे में अशोक गहलोत राजनीतिक बाजी मार गए। उनके बयान ने उनका नैतिक कद बढ़ा दिया। क्योंकि बीजेपी और उसके नेता असली मुद्दे पर जवाब देने के बजाय मामले को भटकाने लगे। गहलोत के बेटे के बहाने अपना बचाव की कोशिश करते दिखे। आम तौर पर बीजेपी नैरेटिव सेट करती है और कांग्रेस उस पर चलती है। लेकिन राजस्थान में सत्ता के विरोध में नैरेटिव इस बार कांग्रेस के दिग्गज नेता गहलोत ने सेट किया है। मुद्दा बीजेपी नेताओं की सत्ता में दखलंदाजी का है और बहस उसी पर जारी है।

गहलोत के सवाल पर सियासत सुलग उठी
राज्सथान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे गहलोत ने कहा था कि नेताओं और मंत्रियों के बेटे और परिवारजन सरकार के काम काज से दूर रहें। बस, इतने भर से ही सियासत सुलग गई। बीजेपी भड़क गई। गहलोत के किसी का भी नाम लिए बिना ही मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का बयान आया। मंत्री मुखर हुए। प्रदेश अध्यक्ष तमतमाए। तो, बीजेपी के बाकी नेता भी बोले। जवाब मुद्दे पर कम, व्यक्ति पर निशाना ज्यादा था। बीजेपी बोली – गहलोत अपने बेटे को स्थापित नहीं कर पाए। इसलिए इस तरह की बातें कर रहे हैं। बीजेपी की ये रणनीति नई नहीं है। मुद्दे को छोड़ो। व्यक्ति पर सवाल उठाओ। बहस को दूसरी दिशा में ले जाओ। असल सवाल था – सत्ता में परिवार की दखलंदाजी क्यों हो रही है? लेकिन चर्चा हो गई – गहलोत अपने बेटे को आगे नहीं बढ़ा पाए। यही राजनीतिक डायवर्जन है। यानी मुद्दे से ध्यान हटाकर नैरेटिव बदल देना। बीजेपी और उसके नेता इसमें माहिर है।
असल मामला राजनीतिक नैतिकता का
सत्ता में परिवारजनों के दखल का ये विवाद दो स्तर पर चल रहा है। पहला स्तर नैतिकता का है कि राजनीति में परिवारजनों का प्रभाव सीमित होना चाहिए। और दूसरा नैरेटिव का। कौन किसे गलत साबित करेगा? बीजेपी नैरेटिव बदल रही है। गहलोत मुद्दे को बनाए रखना चाहते हैं। वे अनुभवी नेता हैं। जानते हैं कि कौन सा मुद्दा कब उठाना है। उनका यह बयान तीन स्तर पर काम कर रहा है – नैतिक ऊंचाई, बीजेपी को रक्षात्मक करना और खुद की उजली छवि को और चमकाना। गहलोत ने बहुत सादगी से ये कर लिया। यही उनकी शैली है। मगर, बीजेपी ने आक्रामक जवाब चुना। जवाब में मुद्दे की जगह व्यक्ति आया। यानी गहलोत बनाम बीजेपी। यह रणनीति बीजेपी के अल्पकालिक सुकून दे सकती है। लेकिन सत्ता में परिवारजनों के दखल का सवाल जिंदा है।

सरकारों में प्रभाव तो परिवारजन भी रखते हैं
राजस्थान की मौजूदा बीजेपी सरकार पर पहले भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं। कुछ नेताओं के परिवारजन वास्तव में सत्ता में दखल देते हैं, अफसरों पर प्रभाव रखते हैं। फैसलों में दखल देते हैं और सिस्टम को प्रभावित करते हैं। हालांकि ये आरोप हमेशा औपचारिक रूप से साबित नहीं होते। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा जरूर रहती है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के बेटे अभिषेक शर्मा हों या उप मुख्यमंत्री डॉ प्रेमचंद बैरवा के बेटे चिन्मय बैरवा, या मंत्री जोगाराम पटेल के बेटे मनीष पटेल, परिवारजनों और रिश्तेदारों को लेकर अक्सर सवाल उठाते रहे हैं। यह राजनीति का संवेदनशील क्षेत्र है। जहां आरोप होते हैं, प्रमाण भी होते हैं। लेकिन सियासत और सत्ता दोनों मिलकर, प्रमाणों को अक्सर अफवाहों में बदल देती है, क्योंकि सत्ता उन्हीं के हाथ है।
गहलोत संन्यास लें, तो पीएम मोदी क्यों नहीं
बीजेपी नेताओं ने सत्ता की शुचिता से जुड़े गहलोत के बयान को व्यक्तिगत लिया। जबकि गहलोत ने स्पष्ट कहा था कि बात सिद्धांत की बात है व्यक्तिगत नहीं। फिर भी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठोड़ बोले कि गहलोत 75 साल के हो रहे हैं और उनको संन्यास ले लेना चाहिए। हालांकि राठोड़ यह भूल गए कि उनके अपने नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 75 साल के हो रहे हैं। तो, क्या पीएम मोदी भी संन्यास ले लें? मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि सोनिया गांधी राहुल गांधी को और गहलोत अपने पुत्र वैभव गहलोत को कई बार लॉन्च करने निकले, लेकिन जनता ने नकार दिया है। बेटे के अतिरिक्त महाधिवक्ता वाले विवाद में उलझे कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा जिनके घर कांच के होते हैं वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। तो, राजेंद्र राठोड ने कहा कि पुत्रमोह रखने वाले गहलोत अब हमको नसीहत दे रहे हैं। बीजेपी के बयानों से साफ था कि ‘डायवर्जन’ कर रही है, वह मुद्दे से भाग रही है और बयानबाजी में उलझा रही है।
बहस जारी, क्योंकि सियासत में बहस ही हथियार
वैसे, राजस्थान की राजनीति में गहलोत का यह बयान सहज नहीं। यह संकेत है आने वाले संघर्ष का। एक तरफ गहलोत हैं। जो सिद्धांत की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी है। जो जवाब तो दे रही है। लेकिन मुद्दे से भटककर। सवाल अब भी वही है कि क्या सत्ता में परिवार का हस्तक्षेप होना चाहिए? दरअसल विवाद सतही नहीं है। इसके पीछे गहरी रणनीति है। गहलोत ने इस बयान के बहाने एक बड़ा नैरेटिव सेट कर दिया हैं। बीजेपी जब तक इसका स्पष्ट जवाब नहीं देती, इस बयान पर बहस चलती रहेगी और बहस दर बहस गहलोत का नैतिक कद ऊंचा होता रहेगा। फिर इतना तो आप भी जानते ही है कि राजनीति के मैदान में बहस ही नेता का कद तय करती है।
-निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
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