Ashok Gehlot: राजस्थान की राजनीति के धुरंधर पूर्व सीएम अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) 3 मई को 75 साल के हो जाएंगे। यह केवल जन्मदिन का प्रसंग नहीं है। यह कांग्रेस (Congress) के उस सुदीर्घ और धूल-धूप से भरे राजनीतिक कालखंड का पड़ाव है, जिसमें संगठन, सत्ता, समाज-कल्याण, जातीय संतुलन, अल्पसंख्यक भरोसा और गांधीवादी भाषा एक ही व्यक्ति की राजनीतिक देह में बसते रहे। मुझे अभी तक नहीं मालूम कि इस दिन कांग्रेस कोई बड़ा कार्यक्रम कर रही है या नहीं; लेकिन अगर कांग्रेस का वर्तमान प्रदेश नेतृत्व अगर अपनी संस्कृति में विश्वास करता है तो उनके लिए एक बड़ा कार्यक्रम किया जाना चाहिए। आज राजस्थान (Rajasthan) में अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के समकक्ष और कौन नेता हैं? भले उनकी आलोचनाओं, कमज़ोरियों और नाकामयाबियों के किस्सों को भी हम सच मान लें। वसुंधरा राजे दो साल बाद 75 की होंगी।
कांग्रेस-शैली के अंतिम बड़े प्रतिनिधि
गहलोत का जन्म 3 मई 1951 को जोधपुर में हुआ और वे राजस्थान के मुख्यमंत्री तीन अलग-अलग कार्यकालों में रहे। 1998–2003, 2008–2013 और 2018–2023। वे कांग्रेस के आखिरी “ओल्ड गार्ड” इसलिए नहीं हैं कि वे केवल पुराने हैं; वे इसलिए हैं कि वे उस कांग्रेस-शैली के अंतिम बड़े प्रतिनिधि हैं, जिसमें नेता मंच पर जितना होता था, उससे अधिक संगठन की तहों में होता था। अशोक गहलोत इस बात के प्रमाण हैं कि कोई साधारण कार्यकर्ता अगर सजग होकर काम करे तो किस तरह किसी शिखर को छू सकता है। गहलोत ने छात्र-राजनीति, सामाजिक काम, लोकसभा, केंद्रीय मंत्रिमंडल, प्रदेश कांग्रेस, अखिल भारतीय कांग्रेस और मुख्यमंत्री कार्यालय तक की लंबी सीढ़ियाँ चढ़ीं। वे जादूगर के बेटे रहे, पर राजनीति में उनका जादू मंचीय चमत्कार का नहीं, धैर्य, प्रतीक्षा, संकट-प्रबंधन और तंत्र की नसें पहचानने की क्षमता का था।

कांग्रेस को केवल चुनावी दल नहीं रहने दिया
तीन बार मुख्यमंत्री रहना अपने आप में बड़ी बात है; लेकिन गहलोत की राजनीति को केवल इस पद-सूची से समझना भूल होगी। उनका बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने राजस्थान में कांग्रेस को केवल चुनावी दल नहीं रहने दिया; उसे सामाजिक सुरक्षा, जन-कल्याण, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, गरीबों और ग्रामीण मतदाता की भाषा दी। उनके शासनकालों में कल्याणकारी राजनीति उनकी केंद्रीय पहचान बनी। आलोचक इसे “फ्रीबी मॉडल” कह सकते हैं, पर गहलोत इसे राज्य की नैतिक जिम्मेदारी की तरह पेश करते रहे। यही उनका सबसे बड़ा राजनीतिक वाक्य रहा: राज्य सिर्फ़ राजस्व और आदेश का नाम नहीं, विपन्न मनुष्य की पीठ पर रखा गया आश्वासन भी है। वे जब यह सब कर रहे थे तो उसे फ्रीबीज़ कहा गया, लेकिन अब जब भाजपा सरकारों में चुनावों के ठीक पहले यह होता है तो टीवी चैनल इसे भाजपा की जीत की बुनियाद के रूप में पेश करते हैं।
कांग्रेस आखिर ऐसे नेता को कैसे देखे
हालांकि इसमें कोई शक़ नहीं कि गहलोत की ताकत ही कांग्रेस की कमज़ोरी भी बनी। वे संगठन को बचाने वाले नेता थे, पर उनके रहते कांग्रेस में उत्तराधिकार का प्रश्न हमेशा काँटेदार रहा। सचिन पायलट प्रकरण ने यही दिखाया कि पुरानी कांग्रेस और नई महत्वाकांक्षी कांग्रेस के बीच पुल बनना आसान नहीं है। गहलोत ने सरकार बचाई, पर पार्टी की पीढ़ीगत बेचैनी को पूरी तरह संबोधित नहीं कर सके। वे सत्ता-संरक्षण के अद्भुत कारीगर रहे, पर सत्ता-संक्रमण के सहज शिल्पी नहीं बन पाए। कांग्रेस के लिए प्रश्न यही है कि वह ऐसे नेता को कैसे देखे। क्या वह उन्हें केवल अतीत का गौरव माने? क्या उन्हें सक्रिय मार्गदर्शक बनाए? क्या राजस्थान में उन्हें प्रतीक, संरक्षक और सामाजिक भरोसे की धुरी के रूप में इस्तेमाल करे? या फिर नई पीढ़ी की बेचैनी के डर से उन्हें धीरे-धीरे किनारे रख दे?

सत्ता से बाहर होकर भी अप्रासंगिक नहीं
गहलोत का 75वाँ वर्ष कांग्रेस के लिए केवल शुभकामना कार्ड लिखने का अवसर नहीं, आत्म-परीक्षण का क्षण है। सवाल यह है कि क्या पार्टी अपने इस बड़े नेता के योगदान को किसी गंभीर राजनीतिक संवाद में बदलेगी? क्या उनके 75 साल को राजस्थान में कांग्रेस की वैचारिक पुनर्समीक्षा, जनकल्याण मॉडल की समीक्षा और भविष्य की नेतृत्व-रेखा पर चर्चा का अवसर बनाया जाएगा?गहलोत की राजनीति की असली विरासत यही है कि उन्होंने कांग्रेस को राजस्थान में बार-बार पराजय से उठने की भाषा दी। वे हार के बाद भी समाप्त नहीं हुए, सत्ता से बाहर होकर भी अप्रासंगिक नहीं हुए। यह किसी भी लोकतांत्रिक नेता की दुर्लभ क्षमता है। वे जननेता हैं, पर आंदोलनकारी नहीं; प्रशासक हैं, पर कठोर नौकरशाहीवादी नहीं; कल्याणकारी हैं, पर वैचारिक रूप से शोरगुल वाले नहीं।
गहलोत जैसे नेता से कांग्रेस ने क्या सीखा
वे कांग्रेस की पुरानी परंपरा के उस अंतिम बड़े राजस्थानी प्रतिनिधि हैं, जिसमें सादगी, सत्ता-कौशल, सामाजिक समीकरण और धैर्य एक साथ चलते हैं। इसलिए 3 मई कांग्रेस के लिए कैलेंडर की तारीख़ नहीं होनी चाहिए। यह वह दिन होना चाहिए जब पार्टी अपने आप से पूछे: अशोक गहलोत जैसे नेता से उसने क्या सीखा, क्या खोया और अब उनके रहते हुए आगे क्या बचाया जा सकता है। क्योंकि ओल्ड गार्ड का सम्मान मालाओं और गुलदस्तों से नहीं होता; उसकी विरासत को भविष्य की रणनीति में बदलने से होता है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह ऐसी तारीख़ है जब कांग्रेस के भीतर उनके वाचाल, मौन और पीठ पीछे के संकोची शालीन विरोधियों को भी एक बड़ा आयोजन करके सम्मानित करना चाहिए। आख़िर आख़िरी ओल्ड गार्ड 75 साल के हो रहे हैं और यह कोई कम बात नहीं है। वे इसके लिए बेशक़ डिज़र्व करते हैं।
– त्रिभुवन (राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार, उनकी ‘एक्स’ वॉल से साभार)
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