CJP: कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने 5 सितंबर को फिर आंदोलन की धमकी दी है। भारतीय जनमानस में सीजेपी एक असाधारण प्रयोग के रूप में उभरी है। लेकिन सोशल मीडिया की व्यंग्यात्मक मुहिम से शुरू हुआ यह आंदोलन अराजकता की चपेट में है और इसके पीछे की वास्तविक स्थिति को दो मुख्य दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है कि जो आंदोलन एक व्यंग्य और छात्र आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, वह अब पूरी तरह राजनीतिक अखाड़ा बन चुका है। और दूसरा यह कि सीजेपी (CJP) का शिक्षा या जनहित से कम सरोकार है, और मुख्य उद्देश्य केवल विशेष राज्यों में जाकर अशांति और अराजकता फैलाना है। सीजेपी को लेकर वर्तमान में देश में एक बड़ा वैचारिक और राजनीतिक गतिरोध देखने को मिल रहा है। हालांकि, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीजेपी, नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार के विरोध में किसी राजनीतिक शक्ति का हथियार है या फिर सोशल मीडिया की एक अस्थायी लहर। असल परीक्षा अब यही है क्या ‘कॉकरोच’ नाम की व्यंग्यात्मक मुहिम भारतीय राजनीति में एक स्थायी जनशक्ति बनती है, या व्यवस्था के खिलाफ पैदा हुआ आक्रोश धीरे-धीरे किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प में विलीन हो जाता है। लोकतंत्र में किसी भी आंदोलन की सफलता का फैसला न तो गालियां करती हैं, न सोशल मीडिया के फॉलोअर और न ही कोई तात्कालिक मुहिम। उसका तो अंतिम फैसला जनता, संगठन और चुनाव ही करते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में भविष्य
भारतीय़ राजनीति के जानकारों के लिए सीजेपी की सबसे बड़ी ताकत उसका पारंपरिक राजनीतिक ढांचा नहीं, बल्कि युवाओं तक सीधी डिजिटल पहुंच है। अभिजीत दिपके के नेतृत्व में आंदोलन ने लाखों युवाओं को एक साझा मुद्दे पर जोड़ा। भले ही सीजेपी के समर्थक कहते रहें कि यदि यह आंदोलन संगठनात्मक रूप लेता है तो 2029 के चुनावों में युवाओं के बीच इसका बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन राजनीतिकत विश्ले,ख निरंजन परिहार मानते हैं कि सोशल मीडिया लोकप्रियता और चुनावी समर्थन दो अलग चीजें हैं। चुनाव जीतने के लिए बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय नेतृत्व, संसाधन, स्पष्ट विचारधारा और लगातार जनसंपर्क चाहिए। सीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उसके आंदोलन की ऊर्जा शुरूआत में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में गंदी गालियों भरी भाषा में सिमट गई, और मोदी विरोध में खप गई है, उसी सै समझा जा सकता है कि वे कितने आगे बढ़ सकते हैं।
गांवों में मारपीट, मोदी को गाली देने का बदला
राजस्थान में जयपुर के रामपुरा कंवरपुरा गांव की घटना ने सीजेपी के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। 21 अगस्त को सरकारी स्कूल का जबरदस्ती निरीक्षण करने पहुंचे सीजेपी कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के बीच विवाद हुआ। राडजसलिथान की राजनीति के जानकार अरविंद चोटिया कहते हैं कि सीजेपी कार्यकर्ताओं को गुस्साए गांव वालों द्वारा रोका गया, उन पर पथराव किया गया और मारपीट भी हुई तथा वाहनों को भी नुकसान पहुंचाया। चोटिया कहतै हैं कि सीजेपी द्वारा अपनी भाषा में, हमले के पीछे बीजेपी के गुंडों का हाथ होने की बात कहते ही उनके राजनीतिक हथकंडे की पोल खुल गई। घटनाक्रम के संबंध में दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे कोर्ट केस के रूप में सामने आए हैं। ग्रामीणों का सीजेपी कार्यकर्ताओं को मोदी को गाली देने का बदला लेने के लिए पीटना यह साबित करता है कि गांव-गांव हो रही ऐसी घटनाओं का एक समान राजनीतिक कारण है।
दिपके, रांका और सौरभ की हकीकत
औरंगाबाद के अभिजीत दिपके सीजेपी के संस्थापक और सबसे प्रमुख चेहरा हैं। वह राजनीतिक कम्युनिकेशन से जुड़े रहे हैं, पुणे से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बोस्टन युनिवर्सिटी से पीआर में मास्टर डिग्री हासिल कर चुके हैं। सन 2020 से 2023 के बीच वे आम आदमी पार्टी के डिजिटल चुनाव अभियानों से भी जुड़े रहे और अरविंद केजरीवाल के करीबी रहे हैं। आशुतोष रांका का प्रोफाइल तकनीकी और पब्लिक पॉलिसी पृष्ठभूमि वाला है। वे आइआइटी कानपुर से बीटैक और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री कर चुके हैं तथा मेककेंजी में काम कर चुके हैं। शिक्षा और पर्यावरण से जुड़े अभियानों में उनकी सक्रियता रही है। सौरव दास पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता से जुड़े हैं। वे एमिटी युनिवर्सिटी से पत्रकारिता और जनसंचार की पढ़ाई कर चुके हैं और कानूनी, न्यायिक तथा सामाजिक मुद्दों पर लिखते रहे हैं। सीजेपी ने उन्हें मुख्य प्रवक्ता बनाया था। ये तीनों सोशल मीडिया में प्रभावी चेहरे रहे हैं। लेकिन तीनों की वास्तविक राजनीतिक क्षमता का अंतिम परीक्षण चुनावी राजनीति और लंबे समय तक चलने वाले जनसंगठन में ही होगा।

अराजकता की राजनीति कितनी स्वीकार्य
राजनीति के जानकार सीजेपी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा जोखिम एक ही मानते है, और वह है टकराव। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि भारत में व्यवस्था-विरोधी राजनीति की जगह हमेशा रही है, लेकिन मतदाता अराजकता को स्थायी शासन विकल्प के रूप में स्वीकार करेगा, यह मान लेना जोखिमपूर्ण है। परिहार कहते हैं कि आंदोलनकारी तेवर वोट में बदलने के लिए संयम, नीति और संगठन की जरूरत होती है। वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सिंह का कहना है कि व्यवस्था से सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सरकारी संस्थानों में बिना अनुमति प्रवेश, स्थानीय लोगों से टकराव या हिंसक माहौल सीजेपी के इस आंदोलन की नैतिक ताकत को कमजोर कर रहा है। वरिष्ठ पत्रकतार अरविंद चोटिया कहते हैं कि बीजेपी शासित प्रदेशों के स्कूलों में ही सीजेपी द्वारा कमजोरियां तलाशना भी दिपके, रांका और सौरभ दास की राजनीति की पोल खोल रहा है। महाराष्ट्र के लातूर में स्कूल में कथित अनधिकृत प्रवेश और शिक्षकों को धमकाने के आरोप में दिपके के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने की बात भी सामने आई है। राजस्थान की राजनीति के जानकार हरिसिंह राजपुरोहित कहते हैं कि सीजेपी पर आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया अलग विषय हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं सीजेपी के सामने अनुशासन और वैधता का प्रश्न जरूर खड़ा करती हैं।
मोदी की माफी के पीछे की राजनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभिजीत दिपके के नेतृत्व में नई दिलेली के जंमतर मंतर पर प्रदर्शन के जदैरन उनके समर्थकों द्वारा उन्हें अपशब्द कहने वाले छात्रों को माफ करने की बात कही। राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह कहते हैं कि पीएम मोदी का यह कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था। इसके जरिए सरकार ने टकराव को व्यक्तिगत लड़ाई बनाने के बजाय युवाओं की नाराजगी को अलग मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश की। सिंह कहते हैं कि सीजेपी ने इसके बाद सवाल उठाया कि यदि प्रधानमंत्री ने छात्रों को माफ किया है तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों का क्या होगा, जो कि गलत है। सिंह कहते हैं कि पीएम मोदी ने उनको गालियां देने वालों को माफ किया है, लेकिन कानून भंग करने वालों पर कार्रवाई तय है। प्रदीप सिंह कहते हें कि पीएम मोदी को गाली देने वालों को मोदी के माफ करने की यह रणनीति राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकती है कि विरोध करने वाले युवाओं को दुश्मन के रूप में नहीं, बल्कि संवाद के संभावित हिस्सेदार के रूप में प्रस्तुत करना। लेकिन इससे यह भी तो साबित नहीं होता कि पीएम मोदी अराजकता को स्वीकारने पर सहमत हैं।
केवल मोदी विरोध से राजनीतिक विकल्प नहीं
कॉकरोच जनता पार्टी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह अपनी असाधारण डिजिटल लोकप्रियता को कितनी जल्दी संस्थागत राजनीतिक शक्ति में बदल पाती है। नीट और अन्य परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग तक पहुंचा और देखते ही देखते राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। जुलाई में नई दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन, संसद मार्च और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इसकी राजनीतिक ताकत को लेकर बहस और तेज हुई है। लेकिन केवल मोदी-विरोध या आक्रामक भाषा किसी नए राजनीतिक विकल्प की स्थायी नींव नहीं बन सकती। सीजेपी के पास आज चर्चा, युवा ऊर्जा और डिजिटल पहुंच है; कल उसे संगठन, नीति, स्थानीय नेतृत्व और विश्वसनीयता की जरूरत होगी। फिलहाल उसने 5 सितंबर को दिल्ली में फिर शांतिपूर्ण मार्च का ऐलान किया है, जिससे साफ है कि आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन सरकार ने भी अपनी तैयारी तो कर ही रखी होगी। हालांकि भारतीय राजनीति में अराजकता के लिए कोई स्थान नहीं है, फिर भी सीजेपी के नेता अगर अराजकता के जरिए ही अपनी जगह बनाने पर आमादा हैं, तो फिर देश की राजनीति में उनकी कोई जगह बन जाएगी, यह संभव ही नहीं है।
– आकांक्षा कुमारी
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