Jaichand: कन्नौज के गाहड़वाल राजा जयचंद (Jaichand) भारतीय लोकप्रिय संस्कृति में ‘गद्दार’ या ‘दगाबाज’ का पर्याय बन चुके हैं, लेकिन यह छवि मुख्यतः काव्यात्मक कथाओं पर आधारित है। कुछ लोग इसके ऐतिहासिक तथ्य भिन्न बताते हैं, और उन्हें शक्तिशाली शासक बताते हैं। इस विश्लेषण में हम देखेंगे कि कैसे जयचंद एक गाली बन गए, साहित्य ने उन्हें धोखेबाज का पर्याय बना दिया। पिछले कुष सालों में कुछ इतिहासकार उन्हें महान बताते रहे हैं। लेकिन जयचंद को गद्दार की छवि से मुक्त करना वाकई एक चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि सदियों से लोककथाओं और कुछ ऐतिहासिक विवरणों ने उन्हें मोहम्मद गोरी की मदद करने वाले देशद्रोही के रूप में स्थापित कर दिया है। हालांकि, आधुनिक इतिहासकार इस बात पर सवाल उठाते हैं। लेकिन जयचंद को गद्दार की छवि से आजाद करने के लिए, इतिहास को लोककथाओं से अलग करके और तथ्यों के आधार पर देखने की जरूरत है, जो कि एक कठिन और लंबी प्रक्रिया है।
‘पृथ्वीराज रासो’ से स्थापित हुई जयचंद की गद्दार छवि
‘जयचंद’ शब्द गाली बनने का मूल स्रोत चंदबरदाई का ‘पृथ्वीराज रासो’ (16वीं शताब्दी या बाद का) है, जो ऐतिहासिक नहीं, बल्कि वीरगाथा काव्य है। इसमें वर्णित है: जयचंद ने राजसूय यज्ञ में पृथ्वीराज चौहान को अपमानित किया, द्वार पर उनकी मूर्ति लगवाई। संयोगिता ने स्वयंवर में पृथ्वीराज को वरण किया, जिसे हर लिया। क्रोधित जयचंद ने कथित तौर पर गोरी को बुलाया और तराइन युद्ध (1192) में उसे सहायता दी। यह कथा लोककथाओं में फैली, जहां ‘जयचंद’ का मतलब विश्वासघाती हो गया। मुहावरे जैसे “देश को जयचंदों से खतरा” प्रचलित हुए। वास्तविक इतिहास में गोरी ने पहले पृथ्वीराज को हराया, फिर जयचंद पर चढ़ाई की, कोई गद्दारी का प्रमाण फारसी स्रोतों में नहीं। ‘पृथ्वीराज रासो’ की अनैतिहासिकता (जैसे गोरी को शब्दभेदी बाण से मारना) इसे मिथक सिद्ध करती है।

जयचंद को गाली के संदर्भ से निकालने का प्रयास
सामान्य भाषा में ‘जयचंद’ शब्द दगाबाज, धोखेबाज या विश्वासघाती के लिए प्रयुक्त होता है, खासकर राजनीति और सामाजिक संदर्भों में। पृथ्वीराज की वीरता वाली कहानियों ने जयचंद को खलनायक बना दिया। 20वीं सदी से फिल्मों, नाटकों आदि ने इसे और मजबूत किया। आजकल विवादों में किसी को जयचंद कहना गाली देने जैसा माना जाना आम बात है। भारतीय राजनीति में, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर बोफोर्स घोटाले के आरोप लगाने के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और वे राजीव गांधी और उनकी सरकार के खिलाफ मुखर हो गए थे। उस दौरान राजीव गांधी ने एक चुनावी रैली में वीपी सिंह पर निशाना साधते हुए उन्हें आधुनिक युग का जयचंद कहा था।
इतिहासकारों के मत और राजपूतों की नई कोशिशें
भारतीय इतिहास में जयचंद को आम तौर पर गद्दार कहा जाता है, लेकिन कई इतिहासकार जयचंद को गद्दार कहना गलत मानते हैं। विद्यापति की ‘पुरुष-परीक्षा’ और ‘रम्भामंजरी’ में जयचंद को यवनों का नाश करने वाला कहा गया। डॉ. संग्राम पाटील जैसे विद्वान उन्हें देशभक्त बताते हैं। विकिपीडिया और अन्य स्रोत स्पष्ट करते हैं कि गद्दारी का आरोप निराधार है तथा गोरी को बुलाने वाले अन्य थे। वे ‘दल-पंगुल’ उपाधि वाले पराक्रमी राजा थे। राजपूत समुदाय के एक वर्ग, खासकर गहरवार / गाहड़वाल वंश के वंशज, जयचंद को महान साबित करने का प्रयास कर रहे हैं। सोशल मीडिया, ब्लॉग और फेसबुक पोस्ट में प्रमाण दिए जाते हैं कि संयोगिता हरण पर जयचंद ने पृथ्वीराज को जीवनदान दिया। इतिहासकारों के उद्धरण (‘पृथ्वीराज रासो’, फरिश्ता) से सिद्ध करते हैं कि वे गोरी से लड़े। यह ‘राइटिंग बैक हिस्ट्री’ का हिस्सा है, जहां पृथ्वीराज केंद्रित कथा को चुनौती दी जा रही। हालांकि, मुख्यधारा इतिहास में विवाद बना रहता है।

जयचंद का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
जयचंद्र (1170-1194 ई.) गाहड़वाल वंश के अंतिम प्रमुख राजा थे, जिनका शासन कन्नौज, वाराणसी और उत्तर प्रदेश-बिहार के भागों पर था। फारसी ग्रंथ ‘ताज-उल-मासिर’ में उन्हें विशाल सेना वाला शक्तिशाली शासक कहा गया है, जिसमें 10 लाख सैनिक और 700 हाथी थे। उन्होंने गुजरात के सिद्धराज और चंदेल राजा मदन वर्मा को हराया, तथा मोहम्मद गोरी की सेनाओं को कई बार परास्त किया। 1194 में चंदावर युद्ध में कुतुबुद्दीन ऐबक से हारकर वीरगति प्राप्त की, न कि गद्दारी की। उनके पुत्र हरिश्चंद्र ने गोरी को हराकर वाराणसी के मंदिर पुनर्निर्मित किए, जो जयचंद की विरासत को मजबूत करता है। इतिहासकार प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार श्रीवास्तव कहते हैं कि पृथ्वीराज की मदद न करना उनकी भूल थी, लेकिन गद्दारी का कोई प्रमाण नहीं।
ऐतिहासिक तथ्यों का विश्लेषण आसान नहीं
तथ्य कहते हैं कि जयचंद और पृथ्वीराज चौहान दोनों परस्पर शत्रु थे। लड़ाई संभवतः वर्चस्व की थी। लेकिन गद्दारी का कोई समकालीन प्रमाण नहीं मिलता। हालांकि, फारसी इतिहासकार जयचंद भारत का सबसे बड़ा राजा मानते हैं, वह भी गलत ही है क्योंकि असल में भारत में जयचंद से बड़े भी कई राजा रहे हैं। बहुचर्चित ‘पृथ्वीराज रासो’ काफी लोकप्रिय है, लेकिन उसे वर्तमान इतिहासकार काल्पनिक बताकर जयचंद की महिमा को कम करने वाला बताते हैं। राजपूतों के एक वर्ग की, जयचंद को महान राजा साबित करने की नई कोशिशें बेहद हल्के स्तर की है, ना तो उनके बारे में कोई एतिहासिक तथ्य जुटाए जा रहे हैं और ना ही किसी तरह के शोध – पत्र विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे हैं। इसके उलट ‘पृथ्वीराज रासो’ की सांस्कृतिक पकड़ समाज में बहुत मजबूत है। इसलिए जयचंद को एक शब्द के रूप में गाली के तौर पर माने जाने से रोकना आसान नहीं है। यह सही है कि जयचंद वीर योद्धा थे, लेकिन पृथ्वीराज बहुत महान शासक थे, अतः इतिहास को काव्य से अलग समझना जरूरी है तथा जयचंद के जयकारे लगाने से पहले उनके तथ्य़ों को सही साबित करना भी एक बड़ी चुनौती है।
– निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)
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