Rajasthan Refinery: पचपदरा। रेत का विस्तार। तेल की रिफाइनरी (Refinery)। उम्मीदों का आसमान। रोजगार की फैक्ट्री और ऊर्जा का स्वप्न। लेकिन अचानक आग। सपलपाती लपटों ने रिफाइनरी को लपेट लिया। वह भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के आने से कुछ घंटे पहले। आग से भी तेज, आग की खबर फैली। सियासत उससे भी तेज़ भागी। क्योंकि यह कोई साधारण परियोजना नहीं। दावा एशिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी होने का है। इसीलिए आकांक्षाओं का आकाश भी उतना ही ऊंचा। राजस्थान (Rajasthan) के औद्योगिक भविष्य की धुरी। लेकिन एक लपट ने सबको लपेटे में ले लिया। पूरी तस्वीर बदल दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपरना दौरा टालना पड़ा। लपटें उठीं तो, लपटों के साथ सवाल भी सुलगे। सवालों की आंच में आरोप भी उठे। तो, सियासत भी सज्ज हुई। हर कोई बयान देने लगा। अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने सही कहा, जिनको पचपदरा (Pachpadra) रिफाइनरी की एबीसीड़ी भी नहीं पता, वे भी बयानबाजी कर रहे हैं। असल में, यह परियोजना, सिर्फ उद्योग नहीं। कई राजनेताओं के लिए यह अपनी सियासी पूंजी भी है। जिसे जो मिला, उसी ने मलाई मारी। किसी ने श्रेय लिया, तो किसी ने कमाई काटी। जिसे कुछ नहीं मिला, उसने सवाल उठाया।

सियासत सुलग उठी सवालों की आग से
पजपदरा की इस रिफाइनरी में आग के बाद ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा टल गया। तैयारियां ठंडी पड़ गईं। मंच सजे रह गए। इंतजाम धरे रह गए। करोड़ों का खर्च एक पल में सवाल बन गया। क्या यह सिर्फ आग थी? या प्रबंधन की चूक? या जल्दबाजी की कीमत? राजनीति ने मौका नहीं गंवाया। कांग्रेस हमलावर हुई। कहा, यह सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। अशोक गहलोत बोले – रिफाइनरी राजस्थान के लिए गर्व की बात, लेकिन पीएम की विजिट के पहले आग लगे, तो सवाल तो खड़े हो ही जाते हैं। हनुमान बेनीवाल बोले – राजस्थान सरकार दुनिया भर में निवेश का आग्रह लेकर घूमती है, लेकिन उद्योगों में आग लगे, तो सरकार पर जनता का भरोसा कम होता है। बीजेपी ने पलटवार किया। कहा, यह दुर्घटना है। सच है कि बड़ी परियोजनाओं में जोखिम भी बड़े होते हैं। और यहीं से, एक रोजगार प्रदाता रिफाइनरी का मुद्दा बदल गया। पीएम का दौरा टल गया।
दो – दो बार शिलान्यास की सियासत
रिफाइनरी में अचानक लगी आग, अब सिर्फ आग नहीं रही। वह सियासी सामान बन गई। एक तरफ सवाल कि क्या तैयारियां अधूरी थीं? क्या सुरक्षा मानक ढीले थे? क्या उद्घाटन की हड़बड़ी भारी पड़ी? दूसरी तरफ जवाब कि क्या हर दुर्घटना को राजनीति का हथियार बनाना सही है? सच, बेचारगी के साथ बीच में कहीं खड़ा है। रिफाइनरी का सफर लंबा रहा है। सपना तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने देखा। आधारशिला 18 सितंबर 2013 को तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रखी। उसी साल कांग्रेस की सरकार चली गई। चार साल काम बंद रहा। 2018 के 16 जुलाई को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पीएम मोदी से कार्य शुभारंभ के नाम पर फिर शिलान्यास करवाया। लेकिन सरकार फिर बदल गई और कमान एक बार फिर अशोक गहलोत के हाथ। रिफाइनरी बनी। तो, अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में पीएम मोदी से लोकार्पण की तैयारी। हर चरण, राजनीति से रंगा रहा। हर मील का पत्थर हाथ में उठा हुआ, और हर वार बयानबाजी में घिरा हुआ।

आग ने आईना दिखाया और अवसर भी
प्रदेश में प्रधानमंत्री का यह पहला दौरा है, जो निरस्त हुआ है। करोड़ों के खर्च से दौरे की तैयारियां हुईं। लेकिन अब हर तैयारी पर सवाल है। क्या यह खर्च उचित था? जब परियोजना पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी? या यह एक अनिवार्य प्रक्रिया थी, जिसमें जोखिम तो हमेशा ही रहता है? यहां जवाब आसान नहीं हैं। लेकिन सवाल जरूरी हैं। सियासत ने ताप बढ़ा दिया है। कांग्रेस, आक्रामक है। बीजेपी, रक्षात्मक होते हुए भी आत्मविश्वास दिखा रही है। परिदृश्य पलट गया है। जो कल तक उपलब्धि थी, आज बहस है। जो कल तक गर्व था, आज जांच का विषय है। लेकिन असली मुद्दा क्या है? रिफाइनरी का भविष्य। उसकी सुरक्षा। और उससे जुड़े लाखों सपने। क्या आग ने उन सपनों को झुलसा दिया? या यह सिर्फ एक अस्थायी झटका है? आग ने सबको आईना दिखाया और अवसर भी दिया।
जांच हो तो दोषी को सजा भी तय हो
राजस्थान कोई औद्योगिक प्रदेश नहीं है, इसीलिए यहां की अर्थव्यवस्था के लिए, यह परियोजना गेम चेंजर है। रोजगार। निवेश। औद्योगिक विस्तार। इन सबका केंद्र पश्चिमी राजस्थान। इसलिए, इस आग की इस घटना को सिर्फ सियासत में सीमित करना न्याय नहीं होगा। जरूरत है तथ्यों की। जांच की। जवाबदेही की। अगर चूक हुई है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अगर नहीं, तो अफवाहों पर विराम लगना चाहिए। जब वेदांता के एक प्रोजेक्ट में दुर्घटना पर सीधे, उसकी संचालक कंपनी के चेयरमेन अनिल अग्रवाल पर मुकदमा हो सकता है, तो पचपदरा रिफाइनरी के चेयरमेन पर मुकदमा क्यों नहीं? सरकार के लिए सिर्फ जांच की घोषणा काफी नहीं। जमीन पर मजबूत कार्रवाई जरूरी है। विपक्ष के लिए हर घटना, हमला करने का बहाना नहीं। कभी समाधान भी देना पड़ता है। लेकिन क्या ऐसा होगा? या फिर, यह मुद्दा भी भाषणों में खो जाएगा?

सियासत झुलसा देगी, लेकिन जवाब नहीं देगी
भारत की सियासत में घटनाएं घटती हैं, और मार दी जाती हैं। सियासत उसे भुलाने की कोशिश में दूसरी राह पकड़ लेती है। लेकिन पचपदरा राजस्थान में है। जहां सियासत जातियों की जकड़न में जिंदा है। लोग भूलते नहीं हैं। बदला लेते हैं। इसीलिए तथ्य कम और कथाएं ज्यादा बनती हैं। पचपदरा की आग भी अब एक कथा बन चुकी है। जिसे हर पक्ष अपने तरीके से गढ़ रहा है। लेकिन जनता? वह देख रही है। समझ रही है। और जान भी रही है। इसीलिए इंतजार कर रही है, सच का। क्योंकि अंत में, न तो बयान काम आएंगे, न आरोप। काम आएगा सुरक्षित रिफाइनरी का सच। स्थिर विकास। और भरोसेमंद शासन। अगर यह मिला, तो फिर ये आग सच में एक घटना रह जाएगी। लेकिन जवाब अगर नहीं मिला, तो यह आग, सियासत को भी झुलसा देगी। और तब, न श्रेय बचेगा, न बहाने और न ही सपनों की उम्मीद। अगर कुछ बचेगा, तो सिर्फ सवाल।
– निरंजन परिहार (राजनीतिक विश्लेषक)

