Somnath: सोमनाथ… अरब सागर के किनारे खड़ा वह धार्मिक गर्व, जो हर टूटन के बाद और अधिक चमक कर निखरा। जनवरी की हवाएं ठंडी है, और उसी ठंड में इतिहास की एक और बेहद तीखी हवा वाला हजार साल। सन 1026 की स्मृति का एक हजारवां वर्ष, और 2026 में उसी स्मृति के मंच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का कदम। मोदी की यह सोमनाथ सिर्फ एक यात्रा नहीं थी। यह एक संदेश था, सीधे जन-मन के भीतर उतारा गया राजनीतिक संदेश। जहां मंदिर है, वहां मंच भी है। सोमनाथ (Somnath) मंदिर में प्रधानमंत्री की मौजूदगी किसी साधारण धार्मिक अनुष्ठान जैसी नहीं दिखती। यह एक तयशुदा दृश्य-रचना थी – ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’, ‘शौर्य यात्रा’, 108 घोड़ों का जुलूस, ओंकार मंत्र, और ड्रोन शो—मानो आस्था के कैनवास पर सत्ता ने अपना सबसे चमकीला पोस्टर चिपका दिया हो। मोदी जानते हैं कि भारत के मतदाता के भीतर विकास एक भाषा है, लेकिन धार्मिक गौरव उसकी धड़कन। और सोमनाथ, उसी गौरव का सबसे ऊंचा शिखर। साल 2026 के शुरू होते ही, 10-11 जनवरी को आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ में बीजेपी (BJP) के दिग्गज नेता और प्रधानमंत्री मोदी की भागीदारी ऐसे समय हुई जब देश में लोक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सुरक्षा विमर्श और पहचान राजनीति के मुद्दे पहले से अधिक धारदार हो चुके हैं।
त्रिशूलधारी मोदी की तस्वीर से ही संदेश साफ
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के बहाने देश को बताया गया कि साल 2026 केवल हमारे कैलेंडर का साल नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्मृति का पड़ाव है, 1000 साल पहले हमला हुआ था, फिर भी सोमनाथ खड़ा है। यहीं से राजनीति शुरू होती है। क्योंकि इतिहास का ज़िक्र जब सत्ता करे, तो वह सिर्फ बीते कल की बात नहीं करता, वह आज की पहचान भी गढ़ता है। प्रधानमंत्री मोदी का नैरेटिव स्पष्ट है। तब भी हमला हुआ था, अब भी भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। लेकिन अब भारत कमज़ोर नहीं, भारत जागा हुआ है। यह धार्मिक भावना नहीं, राष्ट्रवादी व्याकरण है। और शौर्य यात्रा, वह जनता की नस में गौरव, विपक्ष की नस में दबाव बनाने का साधन है। इस शौर्य यात्रा में मोदी डमरू व भगवा से सजा चमकता त्रिशूल हाथ में लिए चले। यह तस्वीर नहीं, यह एक अति-सुनियोजित प्रतीक था। कैमरा जानता था कि किस कोण से इतिहास दिखाना है, और रणनीतिकार जानते हैं कि किस कोण से चुनाव। ध्यान दीजिए, यहां पूजा भी है और परफॉर्मेंस भी। हमारे हिंदुस्तान में मंदिर अब सिर्फ ईश्वर का घर नहीं रहा, वह राजनीतिक ऊर्जा का पावर स्टेशन बन चुका है।

हजार साल का तीर, निशाना आज पर
सोमनाथ की लहरों के बीच मोदी ने जिस तरह तुष्टीकरण की राजनीति पर तंज कसा, उसने इस यात्रा को और धार दे दी। वे बोले, कुछ लोग सोमनाथ मंदिर पर हमले को आस्था पर हमला नहीं, केवल लूट बताकर छोटा करते रहे। राजनीतिक विश्लेषक निरंजन परिहार कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह वाक्य विपक्ष पर सीधी चोट था, मगर बिना किसी पार्टी का नाम लिए। परिहार कहते हं कि यह मोदी की राजनीतिक शैली है कि दुश्मन गढ़ो, मगर नाम भी न लो। इसका लाभ यह कि समर्थक समझ जाते हैं, विरोधी भड़कते हैं, मगर बोल नहीं पाते और देश के लिए हेडलाइन तैयार हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार जगदीश आचार्य कहते हं कि सोमनाथ के बारे में कोई भी बात हिंदू समुदाय पर ‘तत्काल असर’ करती है। आचार्य सोमनाथ के इस, आयोजन को मंदिर को महमूद गजनी द्वारा लूटे जाने की 1000वीं वर्षगांठ को एक बड़ा आयोजन बनाने को बीजेपी के अधिक से अधिक राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति की तैयारी मानते है।

सरदार पटेल के रेखांकन में नेहरू का संदेश
इसी तरह से सरदार पटेल का रेखांकन हुआ, जिसने कांग्रेस की छाती पर राजनीतिक हथेली रख दी है। मोदी ने सोमनाथ के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभ भाई पटेल का संदर्भ उछाला। वरिष्ठ पत्रकार यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, यह कांग्रेस के ऐतिहासिक नैरेटिव को चुनौती देने का तरीका भी है, बिना कांग्रेस का नाम लिए। दरअसल, पटेल का नाम लेते ही बीजेपी दो लाभ एक साथ ले लेती है। पहला तो यह कि वह राष्ट्रनिर्माण की विरासत अपने साथ ले लेती है और दूसरा यह कि वह कांग्रेस के इतिहास-स्वामित्व को चुनौती देती है। सोमनाथ का मंच और पटेल का नाम, यह कॉम्बिनेशन भाजपा के लिए गुजरात में भी और देश में भी सटीक सिग्नल है। सोमनाथ में सरदार वल्लभ भाई पटेल के योगदान को सराहने की मोदी की इस स्मरणांजलि ने सीधे संदेश दिया कि उस दौर में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर निर्माण के विरोध में खड़े थे, फिर भी सरदार पटेल ने हिम्म्त दिखाई।
गुजरात मोदी की प्रयोगशाला, देश के लिए ट्रेलर
यह पूरा दृश्य गुजरात में है। वही गुजरात, तो मोदी की कर्मभूमि और बीजेपी की सबसे पक्की जमीन। यहीं आकर दिया गया संदेश आम तौर पर राष्ट्रीय होता है, क्योंकि गुजरात की कहानी को अक्सर एक मॉडल माना जाता है। सोमनाथ यात्रा उस बड़े प्रोजेक्ट का हिस्सा दिखती है जिसमें बीजेपी संस्कृति, सुरक्षा और स्वाभिमान को एक साथ पैक करके जनता के घर तक पहुंचाती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि सोमनाथ में धार्मिक कार्यक्रम के बाद गुजरात के विकास और इन्फ्रास्ट्रक्चर इवेंट्स जोड़कर संदेश दिया गया कि संस्कृति और विकास दोनों एक साथ चल रहे हैं। यह वही रणनीति है जिसमें राष्ट्र को राजनीतिक इकाई से आगे सभ्यता – राज्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके जरिए सरकार अपने सांस्कृतिक एजेंडे को प्रशासनिक नीतियों जितना ही जरूरी बनाती है।

यात्रा मंदिर तक नहीं रुकी, वह मन तक गई
प्रधानमंत्री मोदी की सोमनाथ यात्रा को केवल धार्मिक आस्था कह देना, राजनीति को न समझना होगा। यह एक मैसेज-ट्रिप थी, जिसमें समुद्र की लहरों के पीछे इतिहास की गरज और कैमरे के फ्रेम में सत्ता की रणनीति थी। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा की जारी तस्वीरें देख कर ही इसके संदेश को समझा जा सकता है। प्रधानमंत्री ने इतिहास की स्मृति को राष्ट्र की वर्तमान चेतना से जोड़कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को एक बार फिर सक्रिय कियाऔर यह संकेत भी दिया कि आने वाले वक्त में भी भारतीय राजनीति का बड़ा हिस्सा पहचान, इतिहास और प्रतीकों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहेगा। सोमनाथ में मोदी ने देश को बताया कि हम मंदिर भी बचाएंगे, कथा भी लिखेंगे और राष्ट्र की परिभाषा भी तय करेंगे। इसके साथ ही विपक्ष को संदेश भी दिया कि अब लड़ाई सिर्फ नीतियों की नहीं, नैरेटिव की भी है, क्षमता की भी है और सामर्थ्य गढने की भी।
– आकांक्षा कुमारी
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