-निरंजन परिहार
एक थे नारायण बारेठ। संसार से चले गए। चुपचाप चहल कदमी करते हुए। वे सरल थे, विरल थे, विमल थे, विनम्र थे और विराट भी। यह सच है कि वे जैसे थे, वैसे आम तौर पर लोग आसानी से हो नहीं पाते, और यह भी कि नारायण बारेठ (Narayan Bareth) जैसे लोग बार-बार संसार में नहीं जन्मते। लेकिन अपना तो यह तक कहना है कि इस संसार में फिर जन्म मिले, तो बमारे बीच आना ही मत नारायण जी, क्योंकि यह दुनिया आप जैसों को लिए बची ही नहीं हैं। वे नैतिक थे, निरापद थे और किसी संत सरीखे सदा रहे। राजस्थान (Rajasthan) की पत्रकारिता का नैतिक चेहरा थे नारायण बारेठ। अब वे नहीं हैं। लेकिन ऐसी विरासत छोड़ गए, जिसे मौजूदा दौर में सम्हालना हर किसी के लिए आसान नहीं है। यह विरासत उन्होंने शब्दों से नहीं, लेखन से भी नहीं बल्कि अपनी चारित्रिक नैतिकता के मूल्यों से बनाई और उसी पत्रकारीय नैतिकता को आज का मीडिया कैसा तांड़व करवा रहा है, यह किसी से अनजाना नहीं है।

पहली मुलाकात ही आखिरी सांस तक जिंदा रही
वह 1987 का साल था, नारायण बारेठ जोधपुर में नवभारत टाइम्स के संभागीय मुखिया थे। गांधी शांति प्रतिष्ठा के नेमीचंद्र जैन भावुक जी ने उनसे अपनी पहली मुलाकात कराई थी। अपन बच्चे से थे, 16-17 साल के कच्चे बच्चे। अपना ताना – बाना नारायण बारेठ से तब ही बुन लिया गया था। बीस – तीस मिनट की वह मुलाकात उनकी आखिरी सांस तक जिंदा रही और आगे भी जिंदा रहेगी। अपन हर दौर में उनके करीब रहे, दिल के भी और काम से भी। कुछ साल पहले वे लंदन आए थे। बोले – पार्लियामेंट स्क्वायर जाना है, गांधीजी के दर्शन करने। नारायण बारेठ वहां पहुंचे, संसद के सामने आदमकद खड़ी गांधीजी की प्रतिमा को नमन किया, अपनी तस्वीर खिंचवाई और उस दौरान उनके भाव कह रहे थे कि जैसे उनकी लंदन की यात्रा इसी के साथ पूरी हो गई। एक सरल, सादा, सीधा और सच्चा जीवन था नारायणजी का। न कोई दिखावा, न कोई छल। न ही महत्वाकांक्षा और न किसी से होड़। पेशे से भले ही वे पत्रकार थे। लेकिन असल में पत्रकारिता के संस्कार थे, पत्रकारिता की मर्यादा थे और आत्मा भी थे।

अशोक गहलोत पहुंचे अर्थी को कंधा देने
राजस्थान की राजनीति पर उनकी पकड़ अद्भुत थी। नेताओं के चाल चलने से पहले ही वे उसे पढ़ लेते थे और उस चाल की सफलता के सियासी के संकेत भी भांप लेते थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी ताकत थी उनकी विश्वसनीयता। राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत से नारायण बारेठ का परिचय जोधपुर से रहा, जब वे सांसद और पहली बार केंद्र में मंत्री थे। अशोक गहलोतजी से उनकी नजदीकियां इतनी रहीं कि जब नारायण बारेठ संसार से गए, तो गहलोतजी उनके घर पहुंचे, नारायण जी की देह को नमन किया, अर्थी को कंधा दिया और भावुक अंतिम विदाई भी। सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर सत्ता ने उनको अपना पुराना मित्र बताया। दरअसल, दिग्गज राजनेताओं के बेहद के करीब रहने के बावजूद सत्ता बारेठ को बदल नहीं पाई। वे वैसे ही रहे। सरल, संतुलित और निष्पक्ष। मीडिया के आज के माहौल में नारायण बारेठ को किसी महात्मा जैसा माना जा सकता था।
उनका सच शालीन था, कभी किसी को नहीं चुभा
वे राजस्थान की मिट्टी में पले। यहीं के समाज को पढ़ा और यहीं की सियासत की सच्चाई को समझा तो उस सच को सबके सामने भी रखा। बेबाक, बेलाग और बेपरवाह तरीके से। मुख्यमंत्री बदलते रहे। मंत्री, सांसद, विधायक बनते – हारते रहे। सरकारें आती-जाती रहीं। लेकिन एक चीज स्थिर रही, नारायण बारेठ के प्रति उन सबके मन में सम्मान। यह सम्मान पदों उनके चरित्र से पैदा हुआ था। कहते हैं कि सच चुभता है, लेकिन उनके सच में इतनी शालीनता इतनी रही कि उनका कहा किसी को चुभता नहीं था। उनकी भाषा में तल्खी नहीं थी। बात में कटुता नहीं थी। लेकिन सच्चाई पूरी होती थी। बड़े पत्रकार थे। लेकिन बड़े होने के अहंकार से विरत। यह संतुलन नारायण बारेठ ने जाने कहां से सीखा था, कोई नहीं जानता। उनके साथ काम करने का अवसर मिलना मेरे लिए सौभाग्य की बात रही।

पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे नारायण बारेठ
जीवन संघर्षों से सजा था। लेकिन संघर्ष उन्हें कठोर नहीं बना सके। बल्कि अतिरिक्त विनम्र बना डाला। लड़ना उनकी फितरत में नहीं था, पर वे न्यूमोनिया से लड़े, पूरे पांच सप्ताह तक लड़े। आखरी सांस तक लड़े। लेकिन जीवन हार गया, मृत्यु जीत गई। वैसे भी अंततः जीतती तो वही है, अतः नारायणजी का हारना तय था। मगर वे हार कर भी जीत गए, क्योंकि जीवन को पूरी ईमानदारी से जीने वाले और जीतने वाले नारायण बारेठ जैसे दुर्लभ चरित्रों के लिए यह संसार जीने के लिए अब वैसा नहीं बचा है, जिसमें वे सुख की आखरी सांस ले सकते। नारायण बारेठ अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वैसे पत्रकारिता के इतिहास में कुछ बचा नहीं है, फिर भी अगर कभी लिखा भी जाएगा, तो नारायण बारेठ का नाम पत्रकारिता के शिखर पुरुष के रूप में अवश्य शामिल होगा।
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